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Tuesday, February 7, 2012

साँठी वाली सुंडी

 साँठी वाली सुंडी एक ऐसा कीड़ा है जो कपास की फसल में पाए जाने वाले  साँठी, चौलाई व् कुंदरा आदि खरपतवारों के पत्तों को खा कर अपना गुज़ारा करता है। जिला जींद के निडाना गावं में किसानों ने अनेक अवसरों पर इस कीड़े को अपनी कपास की फसल में साँठी को ख़त्म करते हुए देखा है। खरपतवार का प्राकृतिक नियंत्रण। पर अफ़सोस कि बहुत सारे किसानों को भय बना रहता है कि कहीं यह कीड़ा सांठी को ख़त्म करके उनकी कपास की फसल को नुकशान न करदे। इसीलिए वो साँठी को ख़त्म करने के लिए खरपतवारनाशियों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन निडाना खेत पाठशाला के किसान इस साँठी का सफाया करने के लिए किसी खरपतवारनाशी का इस्तेमाल नही करते। उनके खेतों में तो यह साँठी वाली सुंडी ही यह काम कर देती है। उन्होंने कभी भी इस साँठी वाली सुंडी को कपास के पत्ते खाते नहीं देखा। फिर इससे डर कहे का?
 इस कीड़े को कीट विज्ञानं की भाषा में Spoladea recurvalis कहते हैं। इस कीड़े के कुनबे का नाम Crambidae है। इसका वंशक्रम Lepidoptera है। अंग्रेज इस कीड़े को beet webworm कहते हैं। यह कीड़ा भगवान की तरह सर्वशक्तिमान हो या ना हो पर सर्वव्यापी तो है। दुनिया के तकरीबन देशों में पाया जाता है।
इस कीट के प्रौढ़ का रंग गहरा भूरा होता है तथा इसके पंखों पर सफेद धारियाँ होती है। इसकी शिवासन मादा एक-एक करके या गुच्छों में अंडे देती है। अंडे साँठी के पत्तों की निचली सतह पर दिए जाते हैं। इस कीट की मादा पतंगा अपने 12 -14  दिन के जीवन काल में लगभग 200  अंडे देती है। इन अण्डों से 5 -6  दिन में नवजात सुंडियां निकलती हैं। इन नवजात एवं तरुण सुंडियों की त्वचा पारदर्शी व् रंग हरा होता है। बड़ी होने पर इन सुंडियों का रंग लाल सा हो जाता है। इन सुंडियों को पूर्ण विकसित होने में 20 -22  दिन का समय लगता है। इस दौरान ये 4 -5 बार कांजली उतारती है। ये सुंडियां भूखड़ किस्म की होती हैं।  मुख्य शिरा को छोड़कर पुरे के पुरे पत्ते को खा जाती है। ढांचा भर रहे साँठी के पौधे अंतत: सुखकर मर जाते है।
                                         हमारी फसलों में इस सुंडी का उपभोग करने के लिए Cotesia plutellae नामक ब्रेकोन सम्भीरका बहुतायत में होती हैं। ट्राईकोग्रामा नामक सम्भीरका अपने बच्चे इस कीड़े के अण्डों में पालती है। इस कीट के प्रौढ़ों को उड़ते हुए ही लोपा मक्खियाँ पकड़ लेती हैं व् चट कर जाती हैं। डायन मक्खियाँ इस कीट के प्रौढ़ पतंगों का शिकार दिन-धौली करती हैं। दीदड़ बुग्ड़े, फलैरी बुग्ड़े, कातिल बुग्ड़ेसिंगु बुग्ड़े इस कीट के अंडों से जूस व् सुंडियों से खून पीने की ताक में रहते हैं। निडाना के किसानों ने इस कीट के प्रौढ़ पतंगों को मकड़ियों द्वारा लपेटते व् खाए जाते देखा है। मुंद्रो व् सुंद्रो नामक जारजटिया समूह के कीट भी इस कीट को भोजन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। प्रकृति में इतना गज़ब का संतुलन होने के बावजूद भय एवं भ्रम के शिकार किसान इस कीट को काबू करने के लिये पीठ पर कीटनाशी पिठू लादे मिल जायेंगे। ऐसे समझदार किसानों का तो राम बरगा यू कीटनाशी बाज़ार ही रुखाला हो सकता है!

Sunday, January 22, 2012

कुम्हारी-एक कीटनाशी ततैया

 "पतली कमर पर ढुंगे पै चोटी कोन्या !!
सै कुम्हारी पर कुम्हारों आली कोन्या !!"

असल में यह तो भीरड़-ततैयों वाले कुनबे की सै। अपना जापा काढण ताहि यह ततैया चिकनी मिटटी से छोटे-छोटे मटकों का निर्माण करती है। इसीलिए किसानों ने इसका नाम कुम्हारी रख लिया। वैसे तो इस ततैया की दुनिया भर में सैकड़ों प्रजातीय पाई जाती होंगी पर निडाना की कपास व् धान की फसल में तो अभी तक किसानों ने यही एक प्रजाति देखी है। यह कीट एकांकी जीवन जीने का आदि है मतलब समूह की बजाय अकेले-अकेले रहना पसंद करता है। काली, पीली व् गुलाबी छटाओं वाली इस ततैया की शारीरिक लम्बाई तकरीबन 15 -17  मी.मी. होती है। यह सही है कि इस कीट के प्रौढ़ तो फूलों से मधुरस पीकर अपना गुजर-बसर करते हैं पर इनके शिशुओं को अपनी शारीरिक वृद्धि के लिए बिना बालों वाली सुंडियां चाहिए। इसीलिए तो आशामेद होते ही इस कीट की मादा अंडे देने के लिए चिकनी मिटटी के छोटे-छोटे मटकों का निर्माण शुरू करती है। मटकों के लिए घरों से बाहर ऐसी जगह का चुनाव करती है जहाँ ये मटके सूरज के ताप, वायु के वेग और वर्षा की आल से सुरक्षित रह सके। चिकनी मिटटी तलाश कर, उसकी छोटी-छोटी गोलियां बनाती है तथा उन्हें अपने मुहँ और अगली टांगों की सहायता से निर्माण स्थल तक लाती है। इस मादा को एक फेरा पूरा करने में पांच मिनट तथा एक मटका घड़ने में लगभग आधा दिन लग जाता है। इस कपास के पत्ते पर मिटटी तो तीन मटकों के लिए ढ़ो राखी थी पर निर्माण एक का ही कर पाई थी कि फोटों खीचने वालों ने तंग कर दी। मटके घड़ने का काम पूरा करके खेतों में निकलती है यह मादा ततैया। वहां रोयें रहित सुंडियां तलाशती है। एक सुंडी ढूंढने में घंटा लग जाता है। सुंडी मिलते ही अपने डंक द्वारा जहर छोड़ कर उस सुंडी को लुंज कर देती है और उसे मटके में ला पटकती है। प्रत्येक मटके में सात-आठ से दस- बारह सुंडी रखती है। फिर हरेक मटके में अपना एक अंडा रखती है। इसके शिशु इन भंडारित सुंडियों को ही खा-पीकर विकसित होते है। मटके में ही प्युपेसन अवस्था पूरी करते हैं। मटके में अंड-निक्षेपण के बाद यह मादाएं मटके के मुहँ को बंद करना नही भूलती। आवासीय निर्माण के दौरान और बाद में भी ये ततैया मटकों के पास विश्राम नहीं करती। इस ततैया के नर मधुर-मिलन के अलावा दूर से ही सही, इन मटकों क़ी चौकीदारी तो करते हैं।
हमारी फसलों में सुंडियों के नियंत्रण के लिए बड़े काम क़ी हैं ये कुम्हारी। जिस तरह से कुम्हारों ने इस कीट से मटके बनाना सीखा ठीक उसी तरह से किसानों को इस कीट से कीट नियंत्रण के पहाड़े सिखने आवश्यकता है। और हमेँ किसानों के लिए व्यापक पैमाने पर कीट साक्षरता अभियान चलाने क़ी।

Thursday, November 3, 2011

मलंगा- धान की फसल में एक कीट


मलंगा धान की फसल में पाया जाने वाला एक नाम लेवा सा राष्ट्रव्यापी कीट है. पर धान की फसल में हानि पहुँचाने की स्तिथि में कभी-कभार ही पहुँचता है. यह कीट धान के पत्तों सम्मेत  पौधे के किसी भी भाग से रस चूसकर गुज़ारा कर लेता है. खानपान के मामले में इस कीट के शिशु (निम्फ) भी अपने बुजुर्गों का अनुशरण करते है. प्रौढ़ एवं निम्फ दोनों ही दुधिया दानों के रस को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं, यही कारण है कि ये धान की फसल में बालियाँ निकलने पर ही ज्यादा दिखाई देते है. 
 इस मलंगे को अंग्रेजी जगत में Rice Gundhi Bug तथा विज्ञान जगत में leptocorisa acuta कहा जाता है. इसका वंशक्रम Hemiptera व् खानदान Coreidae है. सलोने रंग-रूप के इन प्रौढ़ों का बदन छरहरा एवं लम्बा होता है. इनकी टांगें व् एंटीने भी अच्छे-खासे लम्बे होते हैं. प्रकृति प्रदत्त इनका रंग हरिया भूरा सा तथा दर्जी के नाप अनुसार इनके शारीर की लम्बाई तक़रीबन 20  मि.मी. होती है. इनके नवजात तो बामुश्किल २ मि.मी. लम्बे तथा पीले से हरे रंग के होते हैं. पर शारीरिक वृद्धि के साथ-साथ इनका रंग भी हरे से भूरे रंग का होता जाता है.
हमारे हरियाणा में धान की फसल में यह कीट अगस्त के आखिर सी में दिखाई देने लग जाते हैं. इस कीट की मादा मधुर-मिलन के बाद पीले रंग के 24 -28  गोल-गोल अंडे पत्तों पर लाइन में रखती है. इन अण्डों से नवजात निकलने में 5 -6  दिन का समय लग जाता है तथा ये नवजात प्रौढ़ों के रूप में विकसित होने के लिए 17 -18  दिन का समय ले लेते हैं. इस दौरान ये शिशु छ: बार कांजली उतारते हैं. इस कीट का प्रौढीय जीवन 30 -32  दिन का होता है. इस कीट के प्रौढ़ एवं निम्फ सुबह-शाम ज्यादा सक्रिय रहते हैं.
     हमारे पुरखे तो छानी हुई राख का फसल पर छिडकाव करके ही इस कीट के नियंत्रण की इतिश्री कर लेते थे. पर आज कल के प्रगतिशील किसान तो बाज़ार से महंगे, नवीनतम व् घातक कीटनाशी खरीदकर फसल में प्रयोग करके ही अपनी पटरानियों को अपने कृषि ज्ञान का अहसास कराते रहते हैं. उन्हें यह मालूम नही होता कि असंख्य मांसाहारी कीट भी इन कीटों को खा-पीकर हमारी फसलों में मुफ्त में ही कीटनाशियों वाला काम करते हैं. लोपा मक्खियाँ व् डायन मक्खियाँ इस मलंगे के प्रौढ़ों का उड़ते हुए ही शिकार कर लेती हैं. किसानों ने इस कीट के प्रौढ़ व् निम्फ मकड़ियों के जाले में उलझे हुए देखे हैं. रणबीर मलिक ने हथजोड़े को इस कीट का शिकार करते हुए देखा है. रामदेवा के खेत में धान की फसल में हथजोड़े की अंडेदानी अनेक किसानों ने देखी है. आफियाना बीटल को धान की फसल में इस कीट के साथ लटोपिन हुए, रमेश ने देखा है. लेडी बीटलों के प्रौढ़ों एवं गर्बों को इस मलंगे के अंडे खाने का परहेज़ नही होता.
विभिन्न किस्म के फफुन्दीय रोगाणु भी इस कीट पर हमला करते पाए जाते हैं.
 पर अपने खेत में जारी इस प्राकृतिक कीट नियंत्रण के खेल को समय लगा कर समझे कौन?

Sunday, August 28, 2011

बांसिया बुग्ड़ा

 बांसिया बुग्ड़ा कपास की फसल में पाया गया एक छोटा सा कीड़ा है. छरहरे बदन के इस कीड़े की टांगें अत्याधिक लम्बी व् धागेनुमा होती है. इस कीड़े के एंटीना भी बहुत लम्बे होते हैं. इतनी लम्बी टांगों व् एंटीना के बावजूद इस कीड़े के शरीर की लम्बाई बामुश्किल सात से दस मि.मी. ही होती है. Lygaeidae कुटुंब की Jalysus जाती के इस बुग्ड़े की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं. कुछ प्रजातियाँ तो शाकाहारी होती हैं और कुछ प्रजातियाँ आंशिक तौर पर परभक्षी होती हैं. शाकाहारी बुग्ड़े कपास, मक्की, टमाटर, तम्बाकू व् घिया-तोरी आदि के पौधों की पत्तियों की निचली सतह से रस चौसन कर गुज़ारा करती हैं.

     इस कीट द्वारा फसलों में हानि पहुचाने की कोई शिकायत ना तो कभी किसी किसान ने और ना ही किसी कीट-विज्ञानी ने कहीं दर्ज करवाई है. शायद इसीलिए इस कीट की गिनती कपास के मेजर या मायनर कीटों में होना तो दूर की कौड़ी. कीट विज्ञानिक तो कपास की फसल में हानि पहुँचाने कीटों में इस बांसिया बुग्ड़े का जिक्र करना भी मुनासिब नही समझते. करें भी कैसे जब ये बांसिया बुग्ड़े अपने वजूद का अहसास ही नही करा पाते. लेकिन हकीकत यह भी है कि रूपगढ, राजपुरा, इग्राह, निडाना, निडानी, ललित खेडा, भैरों खेडा व् बराह कलां की खेत पाठशालाओं में कपास की फसल में इस कीट को देख चुके हैं.
    

Friday, March 4, 2011

मुफ्त के कीटनाशी - लेडी बीटल

मिलीबग व् चेपे की कुशल शिकारी के रूप में जिला जींद की धरती पर नौ किस्म की बुगडी पायी गयी है. कोक्सीनेलिड्स कुल की इन बुगड़ीयों
के प्रौढ़ भी मांसाहारी अर् इनके बच्चे(GRUB ) भी मांसाहारी. गजब की किसान मित्र है ये लेडी बीटल.। यूरोपियन लोग इन्हें लेडिबीटल या लेडीबग के नाम से पुकारते हैं ।    इनके पंखों की चमक चूड़ियों जैसी होने के कारण  स्थानीय लोगों में कुछ इन्हें मनयारी  कहते हैं  जबकि अन्य इनके पंखों का रंग जोगिया होने के कारण इन्हें जोगन के नाम से पुकारते हैं. कवि महोदय इन कीटों को सोन-पंखी भंवरे के रूप में अलंकृत करते है. निडाना गावं की महिला किसानों ने भी  अपनी यादगारी सुविधा एवं पहचान सुगमता के लिए इन नौ लेडी बीटलों के नाम  लपरो(प्रौढ़, डिम्बक),सपरो(प्रौढ़), चपरो(प्रौढ़), रेपरो(प्रौढ़), हाफ्लो(गर्ब}, ब्रह्मों(प्रौढ़), नेफड़ो(प्रौढ़), सिम्मड़ो(गर्ब) और क्रिप्टो(गर्ब). इन सभी लेडी बीटलों के बालिग व शिशु जन्मजात मांसाहारी कीट होते हैं । इनके भोजन में कीटों के अंडे ,तरुण सुंडियां ,अल या चेपा ,मिलीबग ,चुरडाः ,तेला ,सफ़ेद मक्खी,फुदका आदि अनेक हानिकारक कीट शामिल होते हैं । जिन्हें ये बड़े चाव से खाते हैं । हमारे खेतों में इनकी उपस्तिथि ,कीटनाशकों पर होने वाले खर्च में कटोती करवा सकती है । कीटनाशक चाहे रासायनिक हो या फिर बी.टी.के रूप में जैविक. हम इन लेडी बीटलों को उम्दा किस्म के प्राकृतिक कीटनाशी भी कह सकते हैं क्योंकि ये कीटों को खा कार उनका सफाया करते हैं. यानी कि हमारी फसलों का कीड़ों से बचाव मुफ्त में ही करते हैं जबकि कीटनाशकों पर इसी काम के लिए हमें पैसा खर्च करना पडता है। अतः हम इनकी सही पहचान ,हिफाजत व वंशवृद्धि कर जहाँ खेती के खर्च को घटा सकते हैं वहीं कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से मानव स्वस्थ की रक्षा कर बहुत बड़ी समाज सेवा भी कर सकते हैं। 
निडाना की महिला किसानों ने इस गावं की फसलों में पाई गयी इन नौ किस्म की लेडी बीटलों की न केवल अच्छी तरह से पहचान ही की है बल्कि इन्होनें तो लेडी बीटलों के संक्षिप्त इतिहास व् क्रियाक्लापों पर एक गीत भी लिख डाला. इस गीत को वे विभिन्न अवसरों पर गाती भी हैं.
राजपुरा गावं के भू.पु.सरपंच श्री बलवान सिंह लोहान के  नेतृत्त्व में महेंद्र, प्रकाश, नरेश, भीरा आदि किसानों ने काले के खेत में बी.टी.कपास की फसल पर आये एक नये कीड़े मिलीबग को चबाते हुए एक लपरो को मौके पर पकड़ा था व् इसकी वीडियो तैयार की थी. कीड़ों का कीड़ों द्वारा प्राकृतिक नियंत्रण के इस दृश्य को देखकर सभी किसान हैरान थे.

Sunday, September 5, 2010

जयन्तु- एक परभक्षिया कीटनाशी



राम का घोड़ा ! ना.. बाबा.. ना। यू तो नेता जी सै, पाछले जन्म में हाथ जोड़न की बाण कौन गई - हथजोड़े की । यू जो भी सै, सै पक्का छलिया। देखन में दूब बरगा अर दोनों हाथ जोड़े खड़ा| सिर पर इसकै ताज! मांस खाना मुख्य काज!! फेर तो यू ना राम का घोड़ा अर ना हथजोडा। यू तो होया नमस्ते करकै मारणिया - नमन्तु या जयन्तु । अंग्रेज तो इसनै प्रेइंग मेँटिस कह्या करे। कहण का के सै। कहण नै तो म्हारे बडे-बूढे भी इसकी अंडथैली नै गादड़ की सुंडी कह्या करै। पाड़ लो नै पुन्ज़ड । छोडो नाम, नाम में के धरया सै। इसका काम बताओ?
काम तो इसका एक्के सै। मांस खाणा अर बालक जामणा। आमतौर पर इनके भोजन में मकडी, मक्खी, मच्छर, अल, तेला, चुरडा, तितली, पतंगा, भंवरा, भुंड और सुंडी आदि कीट शामिल होते हैं। पर विशाल प्रजाति के हथजोड़े छोटी-छोटी छिपकलियों, मेंढ़कों, पक्षियों, सांप, मछली और मूषकों तक को भी खाते देखे गये हैं| कुछ फंस ज्याओ , उसे नै रगड़ दे सै। और तो और आगै की होंदे ही अपने मर्द नै भी खा जा सै। सै सही खसमखाणी। खसमखाणी बेशक हो, पर बालक इसने भी बहुत प्यारे लागै सै। इसीलिए तो या रांड अपनी मजबूत अन्डथैली को झाड, कीकर, कैर, हिंस तथा जांडी आदि कंटीले पौधों की टहनियों पर ही चिपकाया करती है । पर यह क्या ? अबकी बार तो इस नै अन्डथैली कांग्रेस घास की टहनियों पर चिपकाई सै। पता सै क्यूँ ? क्योंकि अन्डथैली से निकलते ही इसके नवजात शिशुओं को कांग्रेस घास पर मिलीबग व उसके बच्चे खाणे को मिलेंगे। मैक्सिकन बीटल के प्रौढ़ और गर्ब खाने को मिलेंगे. अर वो भी भरपेट !! इस साल तो इस कीटखोर की अंडेदानी ललित खेडा गाम के राम देवा के खेत में धान की फसल में भी देखी गयी है| निडानी के किसानों ने तो इसकी ये अंडेदानियाँ खरपतवार कहे जाने वाले बथुवा व् मिर्ची-बूटी के पौधों पर भी देख ली. इसका सीधा सा मतलब हुआ कि जहाँ बच्चों के लिए भोजन का जुगाड़ हो - वही अपनी अंडेदानी चिपका दी.
सुना है दुनिया भर में इस कीटखोर की 2200 प्रजातियाँ पाई जाती हैं| पर निडाना गावं में तो अब तक किसान इसकी 7 प्रजातियाँ ही देख पाए हैं| महिला खेत पाठशाला, निडाना (जींद, हरियाणा) की महिलाओं ने कीट नियंत्रण में इस गजब के कीटखोर की कीटनियंत्रण में महती भूमिका को मध्यनजर रखते हुए एक हरियाणवी गीत की रचना की है तथा इस गीत को विभिन्न अवसरों पर इसे गाया भी है. 
तीसरा मौका: गावं में खेत दिवस.








Tuesday, August 25, 2009

प्राकृतिक कीटनाशी - सींगू बुगडा

सींगू बुगड़ा का प्रौढ़।
सींगू बुगडा जिला जींद के परितंत्र में पाया जाने वाला एक सीधा-पादरा खून-चूसक परभक्षी है। वैसे तो यह कीट विभिन्न फसलों में पाए जाने वाले पच्चास से भी ज्यादा भांत-भांत के कीटों का खून चूस कर अपना जीवनयापन करता है। पर सुंडियां मिल जायें तो कहने ही क्या? मिल जाएँ कहीं फसलों में या खरपतवारों पर, इन्हें तो उनका खून चूस कर अपना पेट भरना होता है.
सींगू बुगड़ा के अर्भक।
इस कीट के प्रौढ़ अमूमन आधा इंच लंबे होते हैं व इनके शरीर का रंग भूरा होता है। इनके मजबूत कन्धों पर सींगनुमा कांटे होते हैं शायद इसीलिए यहाँ के किसान इसे सींगु बुगडा कहते हों। पर वैज्ञानिक तो इसे अपनी भाषा में Podisus maculiveentris कहते हैं। इसके परिवार का नाम Pentatomidae तथा इसके वंश का नाम Hemiptera है। इनका प्रौढिय जीवन पैंतीस से पच्चास दिन का होता है। इस बुगडे की मादा अपने जीवनकाल में एक हज़ार तक अंडे दे सकती है। मादा अपने ये अंडे पत्तों की निचली सतह पर गुच्छों में देती है। एक गुच्छे में तकरीबन बीस से तीस अंडे होते हैं। इन अण्डों का रंग क्रीमी से लेकर काला तक होता है तथा देखने में पीतल के बरोले जैसे दिखाई देते हैं जिनके किनारों पर खड़े रुंग होते हैं। इन अण्डों से चार-पाँच दिन में निम्फ निकलते हैं जिनका सिर व धड़ काला तथा पेट सुर्ख लाल होता है। ये निम्फ पहली कान्झली उतारने तक तो बरती ही रहते हैं तथा शेष निम्फल जीवन खून-चूसक परभक्षी के तौर पर बिताते हैं। इनका यह निम्फल जीवन पच्चीस-तीस दिन का होता है।
सींगू बुगड़ा के अंडे एवं अर्भक।
इस बुगडे की मादाओं की खुराक अपने नर साथियों के मुकाबले ज्यादा होती है पर नरों की तुलना में जिंदगानी बहुत कम होती है। नर तो 180 दिन जिन्दा रहते हैं जबकि मादाएं तो सिर्फ़ 125 दिन ही जिन्दा रह पाती हैं। "ज्यादा खुराक-कम जिंदगी" के कारणों की तलाश या तो अति प्रकृति प्रेमी कर सकते है या फ़िर लगनशील कीट-वैज्ञानी। हम किसानों का काम तो इस कीट की पहचान व इसके स्वभाव के बारे में मामूली जानकारी होने से ही चल जाएगा। इस कीट का मांसाहारी होना किसानों के हक की बात है। हमारे फसलतंत्र में इसका पाया जाना लाजिमितौर पर कीटनाशकों पर खर्च को कम करवाएगा क्योंकि ये बुगड़े भी तो अपने जीवनयापन के लिए कीटों को खत्म करते है. कीटों का नाश करने वाले को हो तो कीटनाशी कहते हैं.

कपास का शाकाहारी कीट - चित्तकबरी सुंडी



 कुछ साल पहले तक हरियाणा प्रदेश में चितकबरी सूंडी कपास की फसल
 का मुख्य हानिकारक कीट होती थी। पर आजकल यह सूंडी कपास की 
फसल में बहुत कम दिखाई देती है। यह सूंडी पै समय का कहर है। या व्यापार का दोपहर है।। - कुछ कह नही सकते। हाँ, इतना जरुर है कि हरियाणा में किसान इस सूंडी को काला कीड़ा, धब्बेदार सूंडी व गोभ वाली सूंडी आदि नामों से जानते व पहचानते हैं। हमारे यहाँ कपास की फसल में इस कीड़े की दो प्रजातियाँ पाई जाती हैः इयरिआस विटैला और इयरिआस इन्सुलाना। इयरिआस विटैला नमी वाले मौसम में ज्यादा पाई जाती है तथा इयरिआस इन्सुलाना खुसकी वाले मौसम में ज्यादा पाई जाती है। इन कीट पंतगों की सिवासण पौधों के पत्तों, शाखाओं एवं फलीय भागों जैसे रोयेदार हिस्सों पर एक-एक करके 200 से 400 तक अण्डे देती हैं। इन अंडों का रंग हल्का नीला होता है। सामान्य परिस्थितियों में इन अंडों से तीन चार दिन बाद नन्ही सूंडियाँ निकलती हैं जो कपास के पौधों की गोभ व फलीय हिस्सों पर हमला करती हैं। जिस कारण गोभ मुरझाकर सूख जाती हैं, बौकी व फूल झड़ जाते हैं, ग्रसित टिंडे समय से पहले खिल जाते हैं तथा टिंडों में फौहा खराब हो जाता है। इस कीड़े की लार्वल अवस्था तकरीबन 10 से 16 दिन की होती है। इसके बाद यह सूंडी प्यूपा बन जाती है। इस कीड़े की यह प्यूपीय अवस्था पौधे के विभिन्न भागों, झड़ी हुई बौकियों व अन्य अवशेषों पर लगभग 4 से 9 दिन में पूरी हो जाती है। इस प्यूपा से प्रौढ़ पतंगे निकलते हैं जो 8 से 20 दिन तक जीवित रहते हैं।

ये पतंगे रात को ही सक्रिय रहते हैं. रात को ही नर-मादा का मधुर मिलन होता है तथा रात को ही अंड-निक्षेपण. दिन में तो इन्हें छुपकर रहना होता है. अन्यथा लोपा मक्खी व् डायन मक्खी इनका उड़ते हुए ही काम तमाम कर देती है. इस कीट के प्रौढ़ों व् सुंडियों के लिए घात लगा कर बैठे भान्त-भान्त(दिद्ड बुग्ड़ा, कातिल बुग्ड़ा, सिंगू बुग्ड़ा, बिन्दुवा बुग्ड़ा, एंथू बुग्ड़ा) के बुग्ड़े भी कपास के खेत में किसानों ने देखे हैं. ये मांसाहारी बुग्ड़े इस कीट के अण्डों से जीवन-रस पीने में भी माहिर होते हैं.























Monday, June 1, 2009

जंगीरा- एक परजीव्याभ सम्भीरका

 जंगीरा हमारी फसलों में मिलीबग को काबू करने वाली एक परजीव्याभ सम्भीरका है। जी हाँ! उसी विदेशी मिलीबग को जिसने भारत में कपास की खेती के लिए गंभीर समस्या के रूप में देखा जाने लगा था। भला हो इन सम्भीरकाओं का जिन्होंने इस किटिया संकट से निजात दिलाने में जिला जींद के किसानों की भरपूर मदद की।
अंगीरा व् फंगिरा की तरह जंगीरा भी अपने बच्चे मिलीबग के पेट में ही पलवाता है। Hymenoptera वंशक्रम की यह सम्भीरका भी आकर में बहुत छोटी होती है। इसके शारीर की लम्बाई बामुश्किल 2 -3 मी.मी. ही होती है। पर अपने जीवनकाल में 100  से ज्यादा अंडे देती है पर एक मिलीबग के पेट में केवल एक ही अंडा देती है। इस को अंग्रेज किस नाम से पुकारते हैं- हमें नही मालूम। कीट विज्ञानं की भाषा में इसका नाम, खरना, कुनबा व् प्रजाति आदि भी- हमें नही मालूम। पर हमें यह अच्छी तरह से मालूम है कि Hymenoptera वंशक्रम की यह जंगीरा नामक सम्भीरका अपने बच्चे मिलीबग के पेट में पलवाती है। वंशवृद्धि के लिए इन्हें असाधारण कौशल की जरुरत होती है। आवश्यकता अनुसार भोजन उपलब्ध होने पर इसके नवजातों को पूर्ण विकसित होने के लिए 15 -16  दिन का समय लगता है।  इसीलिए इसकी प्रौढ़ मादा को अंडा देने के लिए ऐसे स्वस्थ मादा मिलीबग की तलाश रहती है जिसका जीवन अभी 18 -20  दिन का और बकाया हो। मिलीबग के पेट में अंडे से निकलते ही इस सम्भीरका के नवजात मादा मिलीबग को अन्दर-अन्दर ही खाना शुरू करते हैं। यह प्रक्रिया आरम्भ होते ही मिलीबग पौधों से रस पीना तो छोड़ देता है पर ना तो इसके शारीर से आटानुमा पाउडर उड़ता है और ना ही यह रंग बदलता है। मतलब ऊपर से देखने पर प्रकोपित मिलीबग सामान्य ही दिखाई देता है। इस भली सी सम्भीरका की अंडे से लेकर प्रौढ़ तक की सभी अवस्थाएं मिलीबग के पेट में ही पूरी होती हैं। पर  प्रौढ़ सम्भीरका अपना स्वतंत्र जीवन जीने के लिए हमेशा मिलीबग के अगले सिरे में सुराख़ करके ही बाहर निकलती है। इस प्रक्रिया में मिलीबग को मिलती है-मौत। यही तो किसान चाहते हैं। मिलीबग को ख़त्म करने के लिए किसान कीटनाशकों का इस्तेमाल भी इसीलिए करते हैं। अगर हम सभी को यह अच्छी तरह से जानकारी हो जाये कि मिलीबग को काबू करने के लिए अन्य कीटों के साथ-साथ जंगीरा नामक यह परजीव्याभ सम्भीरका भी हमारी फसलों में मौजूद है तो क्यों कोई किसान किसी कीटनाशक का प्रयोग करेगा?