| Cavelerius excavatus Dist. |
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Wednesday, July 25, 2012
ईंख में काला बुग्ड़ा
Sunday, January 22, 2012
कुम्हारी-एक कीटनाशी ततैया
"पतली कमर पर ढुंगे पै चोटी कोन्या !!
सै कुम्हारी पर कुम्हारों आली कोन्या !!"
असल में यह तो भीरड़-ततैयों वाले कुनबे की सै। अपना जापा काढण ताहि यह ततैया चिकनी मिटटी से छोटे-छोटे मटकों का निर्माण करती है। इसीलिए किसानों ने इसका नाम कुम्हारी रख लिया। वैसे तो इस ततैया की दुनिया भर में सैकड़ों प्रजातीय पाई जाती होंगी पर निडाना की कपास व् धान की फसल में तो अभी तक किसानों ने यही एक प्रजाति देखी है। यह कीट एकांकी जीवन जीने का आदि है मतलब समूह की बजाय अकेले-अकेले रहना पसंद करता है। काली, पीली व् गुलाबी छटाओं वाली इस ततैया की शारीरिक लम्बाई तकरीबन 15 -17 मी.मी. होती है। यह सही है कि इस कीट के प्रौढ़ तो फूलों से मधुरस पीकर अपना गुजर-बसर करते हैं पर इनके शिशुओं को अपनी शारीरिक वृद्धि के लिए बिना बालों वाली सुंडियां चाहिए। इसीलिए तो आशामेद होते ही इस कीट की मादा अंडे देने के लिए चिकनी मिटटी के छोटे-छोटे मटकों का निर्माण शुरू करती है। मटकों के लिए घरों से बाहर ऐसी जगह का चुनाव करती है जहाँ ये मटके सूरज के ताप, वायु के वेग और वर्षा की आल से सुरक्षित रह सके। चिकनी मिटटी तलाश कर, उसकी छोटी-छोटी गोलियां बनाती है तथा उन्हें अपने मुहँ और अगली टांगों की सहायता से निर्माण स्थल तक लाती है। इस मादा को एक फेरा पूरा करने में पांच मिनट तथा एक मटका घड़ने में लगभग आधा दिन लग जाता है। इस कपास के पत्ते पर मिटटी तो तीन मटकों के लिए ढ़ो राखी थी पर निर्माण एक का ही कर पाई थी कि फोटों खीचने वालों ने तंग कर दी। मटके घड़ने का काम पूरा करके खेतों में निकलती है यह मादा ततैया। वहां रोयें रहित सुंडियां तलाशती है। एक सुंडी ढूंढने में घंटा लग जाता है। सुंडी मिलते ही अपने डंक द्वारा जहर छोड़ कर उस सुंडी को लुंज कर देती है और उसे मटके में ला पटकती है। प्रत्येक मटके में सात-आठ से दस- बारह सुंडी रखती है। फिर हरेक मटके में अपना एक अंडा रखती है। इसके शिशु इन भंडारित सुंडियों को ही खा-पीकर विकसित होते है। मटके में ही प्युपेसन अवस्था पूरी करते हैं। मटके में अंड-निक्षेपण के बाद यह मादाएं मटके के मुहँ को बंद करना नही भूलती। आवासीय निर्माण के दौरान और बाद में भी ये ततैया मटकों के पास विश्राम नहीं करती। इस ततैया के नर मधुर-मिलन के अलावा दूर से ही सही, इन मटकों क़ी चौकीदारी तो करते हैं।
Tuesday, January 17, 2012
तरखान ततैया - कीटनाशी ततैया!
Thursday, November 3, 2011
मलंगा- धान की फसल में एक कीट
मलंगा धान की फसल में पाया जाने वाला एक नाम लेवा सा राष्ट्रव्यापी कीट है. पर धान की फसल में हानि पहुँचाने की स्तिथि में कभी-कभार ही पहुँचता है. यह कीट धान के पत्तों सम्मेत पौधे के किसी भी भाग से रस चूसकर गुज़ारा कर लेता है. खानपान के मामले में इस कीट के शिशु (निम्फ) भी अपने बुजुर्गों का अनुशरण करते है. प्रौढ़ एवं निम्फ दोनों ही दुधिया दानों के रस को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं, यही कारण है कि ये धान की फसल में बालियाँ निकलने पर ही ज्यादा दिखाई देते है.
इस मलंगे को अंग्रेजी जगत में Rice Gundhi Bug तथा विज्ञान जगत में leptocorisa acuta कहा जाता है. इसका वंशक्रम Hemiptera व् खानदान Coreidae है. सलोने रंग-रूप के इन प्रौढ़ों का बदन छरहरा एवं लम्बा होता है. इनकी टांगें व् एंटीने भी अच्छे-खासे लम्बे होते हैं. प्रकृति प्रदत्त इनका रंग हरिया भूरा सा तथा दर्जी के नाप अनुसार इनके शारीर की लम्बाई तक़रीबन 20 मि.मी. होती है. इनके नवजात तो बामुश्किल २ मि.मी. लम्बे तथा पीले से हरे रंग के होते हैं. पर शारीरिक वृद्धि के साथ-साथ इनका रंग भी हरे से भूरे रंग का होता जाता है.
हमारे पुरखे तो छानी हुई राख का फसल पर छिडकाव करके ही इस कीट के नियंत्रण की इतिश्री कर लेते थे. पर आज कल के प्रगतिशील किसान तो बाज़ार से महंगे, नवीनतम व् घातक कीटनाशी खरीदकर फसल में प्रयोग करके ही अपनी पटरानियों को अपने कृषि ज्ञान का अहसास कराते रहते हैं. उन्हें यह मालूम नही होता कि असंख्य मांसाहारी कीट भी इन कीटों को खा-पीकर हमारी फसलों में मुफ्त में ही कीटनाशियों वाला काम करते हैं. लोपा मक्खियाँ व् डायन मक्खियाँ इस मलंगे के प्रौढ़ों का उड़ते हुए ही शिकार कर लेती हैं. किसानों ने इस कीट के प्रौढ़ व् निम्फ मकड़ियों के जाले में उलझे हुए देखे हैं. रणबीर मलिक ने हथजोड़े को इस कीट का शिकार करते हुए देखा है. रामदेवा के खेत में धान की फसल में हथजोड़े की अंडेदानी अनेक किसानों ने देखी है. आफियाना बीटल को धान की फसल में इस कीट के साथ लटोपिन हुए, रमेश ने देखा है. लेडी बीटलों के प्रौढ़ों एवं गर्बों को इस मलंगे के अंडे खाने का परहेज़ नही होता.
विभिन्न किस्म के फफुन्दीय रोगाणु भी इस कीट पर हमला करते पाए जाते हैं.
पर अपने खेत में जारी इस प्राकृतिक कीट नियंत्रण के खेल को समय लगा कर समझे कौन?
Sunday, August 28, 2011
बांसिया बुग्ड़ा
बांसिया
बुग्ड़ा कपास की फसल में पाया गया एक छोटा सा कीड़ा है. छरहरे बदन के इस
कीड़े की टांगें अत्याधिक लम्बी व् धागेनुमा होती है. इस कीड़े के एंटीना
भी बहुत लम्बे होते हैं. इतनी लम्बी टांगों व् एंटीना के बावजूद इस कीड़े
के शरीर की लम्बाई बामुश्किल सात से दस मि.मी. ही होती है. Lygaeidae
कुटुंब की Jalysus जाती के इस बुग्ड़े की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं. कुछ
प्रजातियाँ तो शाकाहारी होती हैं और कुछ प्रजातियाँ आंशिक तौर पर परभक्षी
होती हैं. शाकाहारी बुग्ड़े कपास, मक्की, टमाटर, तम्बाकू व् घिया-तोरी आदि
के पौधों की पत्तियों की निचली सतह से रस चौसन कर गुज़ारा करती हैं.
इस कीट द्वारा फसलों में हानि पहुचाने की कोई शिकायत ना तो कभी किसी
किसान ने और ना ही किसी कीट-विज्ञानी ने कहीं दर्ज करवाई है. शायद इसीलिए
इस कीट की गिनती कपास के मेजर या मायनर कीटों में होना तो दूर की कौड़ी. कीट
विज्ञानिक तो कपास की फसल में हानि पहुँचाने कीटों में इस बांसिया बुग्ड़े
का जिक्र करना भी मुनासिब नही समझते. करें भी कैसे जब ये बांसिया बुग्ड़े
अपने वजूद का अहसास ही नही करा पाते. लेकिन हकीकत यह भी है कि रूपगढ,
राजपुरा, इग्राह, निडाना, निडानी, ललित खेडा, भैरों खेडा व् बराह कलां की
खेत पाठशालाओं में कपास की फसल में इस कीट को देख चुके हैं.
Sunday, August 14, 2011
कपास में पत्ता-लपेट सुंडी
कपास की फसल में पाई जाने वाली यह पर्णभक्षी पत्ता-लपेट सुंडी है तो एक नामलेवा सा कीड़ा पर भारत के सभी कपास उगाऊ क्षेत्रों में पाया जाता है. पर यह छिटपुट की सुंडी भी कभी कभार किसानों को नानी याद दिला देती है। अंग्रेजी में इस कीड़े को Cotton leaf-roller कहते हैं। कीट वैज्ञानिक इसे वैज्ञानिक भाषा में Lepidoptera वंशक्रम के Pyralidae परिवार की Sylepta derogata कहते हैं।
इस कीट के पतंगें माध्यम आकार के तथा पीले से पंखों वाले होते हैं। इन पंखों पर भूरे रंग की लहरिया लकीरें होती हैं। पतंगे के सिर व् धड़ पर काले व् भूरे निशान होते हैं। पूर्ण विकसित पतंगे की पंखों का फैलाव लगभग 28 से 40 मि.मी. होता है। अन्य पतंगों की तरह ये पतंगें भी निशाचरी होते हैं। रात के समय ही मादा पतंगा एक-एक करके तकरीबन 200 -300 अंडे पत्तों की निचली सतह पर देती है। इन अण्डों से चार-पांच दिन में शिशु सुंडियां निकलती हैं। ये नवजात सुंडियां अपने जीवन के शुरुवाती दिनों में तो पत्तियों की निचली सतह पर भक्षण करती हैं।पर बड़ी होकर ये सुंडियां पत्तियों को किनारों से ऊपर की ओर कीप के आकार में मोड़ती हैं तथा इसके अंदर रहते हुए ही पत्तियों को खुरच कर खाती हैं। ये सुंडियां अपने वृद्धिकाल में छ: या सात बार कांजली उतारती हैं। इस कीट की यह लार्वल अवस्था लगभग 15 -20 दिन की होती है. यह कीड़ा अपनी प्यूपल अवस्था पौधों पर या फिर इन मुड़ी हुई प्रोकोपित पत्तियों के अंदर ही या फिर जमीन पर पौधों के मलबे में पूरी करता है। इस कीड़े को अपना ये प्यूपल-काल पूरा करने में आठ-दस दिन लग जाते हैं। इस कीट के प्रौढ़ सप्ताह भर जीवित रहते हैं। अपना जीवन सफल बनाने के लिए एक सप्ताह के अंदर-अंदर ही इन प्रौढ़ नर व् मादाओं को मधुर-मिलन भी करना होता है तथा मादाओं को अंड-निषेचन भी करना होता है।
खाने और खाए जाने के इस स्वाभाविक काम में इन्हें भी खाने वाले अनेकों कीट कपास की फसल में पाए जाते हैं। कातिल बुग्ड़े, छैल बुग्ड़े, सिंगू बुग्ड़े, दिद्दड़ बुग्ड़े, बिंदु बुग्ड़े व् दस्यु बुग्ड़े इस कीट की सुंडियों का खून व् अण्डों का जीवन-जूस पीते हैं। विभिन्न प्रकार की लेडी बीटल इसके अण्डों व् तरुण-सुंडियों का भक्षण करती हैं। लोप़ा मक्खियाँ इसके प्रौढ़ों का शिकार करती हैं। हथजोड़े के प्रौढ़ एवं बच्चे इस कीट की सुंडियों का भक्षण करते हैं। कोटेसिया नामक सम्भीरका इस कीट की सुंडियों के पेट में अपने बच्चे पालती है।
खाने और खाए जाने के इस स्वाभाविक काम में इन्हें भी खाने वाले अनेकों कीट कपास की फसल में पाए जाते हैं। कातिल बुग्ड़े, छैल बुग्ड़े, सिंगू बुग्ड़े, दिद्दड़ बुग्ड़े, बिंदु बुग्ड़े व् दस्यु बुग्ड़े इस कीट की सुंडियों का खून व् अण्डों का जीवन-जूस पीते हैं। विभिन्न प्रकार की लेडी बीटल इसके अण्डों व् तरुण-सुंडियों का भक्षण करती हैं। लोप़ा मक्खियाँ इसके प्रौढ़ों का शिकार करती हैं। हथजोड़े के प्रौढ़ एवं बच्चे इस कीट की सुंडियों का भक्षण करते हैं। कोटेसिया नामक सम्भीरका इस कीट की सुंडियों के पेट में अपने बच्चे पालती है।
Friday, August 12, 2011
तुरंगी ततैया!! -एक परजीव्याभ कीटनाशी
तुरंगी ततैया एक परजीव्याभ कीट हैं जो पर्यावरण की दृष्टि से हमारे लिए खास महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनका जीवनयापन व् वंशवृद्धि दुसरे कीटों के जीवन की कीमत पर निर्भर करता है यानिकी ये तुरंगी ततैया हमारी फसलों में कीटनाशियों वाला काम हमारे लिए मुफ्त में करते हैं. अंग्रेजों द्वारा Ichneumon wasps पुकारे जाने वाले इस कीट की ज्यादातर प्रजातियाँ अपने अंडे Lepidoptera कुल की सुंडियों के शरीर पर देती हैं. इन अण्डों से निकले इनके लार्वा इन सुंडियों को खाकर ही पलते-बढ़ते हैं. इनके खाने का सलीका भी गज़ब का होता है. शुरुवात में इल्लियाँ अपनी आश्रयदाता सुंडियों के किसी भी महत्वपूर्ण अंग को नही खाती. बल्कि ये सुंडियों के वसा-ऊतक खाकर ही अपना गुज़ारा करती हैं. पूर्ण विकसित होने पर ही ये सुंडियों के महतवपूर्ण अंगों को खाना शुरू करती हैं. अत: आश्रयदाता सुंडियां परजीव्याभित होने पर कमजोर हो जाती हैं व् इनका विकास धीमा पड़ जाता है और अंतत: इनकी मौत हो जाती है.
-- वैसे तो इस कीट की विश्वभर में हजारों प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो रंग-रूप में एक-दुसरे से भिन्न होती हैं. पर इस कीट की सभी प्रजातियों की मादाओं के पेट के सिरे पर एक लम्बा व् पतला अंडनिक्षेपक होता है. धागेनुमा लम्बे एंटीने, पतली कमर, पारदर्शी पंख व् लम्बा व् पतला अंडनिक्षेपक ही इस कीट की पहचान को आसान बनाते हैं. पर अफ़सोस है, आज कल हरियाणा में कपास की फसल में ये तुरंगी ततैया इका-दुक्का ही दिखाई देती है.
-- वैसे तो इस कीट की विश्वभर में हजारों प्रजातियाँ पाई जाती हैं जो रंग-रूप में एक-दुसरे से भिन्न होती हैं. पर इस कीट की सभी प्रजातियों की मादाओं के पेट के सिरे पर एक लम्बा व् पतला अंडनिक्षेपक होता है. धागेनुमा लम्बे एंटीने, पतली कमर, पारदर्शी पंख व् लम्बा व् पतला अंडनिक्षेपक ही इस कीट की पहचान को आसान बनाते हैं. पर अफ़सोस है, आज कल हरियाणा में कपास की फसल में ये तुरंगी ततैया इका-दुक्का ही दिखाई देती है.
Sunday, August 7, 2011
कपास में चेपा !!
कपास की फसल में फूलने-फलने की एक तरफा छुट तो इस कीड़े को भी प्रदान नही की प्रकृति ने. हमारे यहाँ के कपास-तंत्र में इस कीड़े को खाकर अपना गुज़र-बसर करने वाली दस तरह की लेडी बीटल, दो तरह के कराईसोपा, ग्यारह किस्म की मकड़ियाँ, पाँच प्रकार की सिरफड़ो मक्खियाँ व् भांत-भांत के भीरड़-ततैये किसानों द्वारा मौके पर देखे गये हैं. चेपे को उछाल-उछाल कर खाते हुए सिरफड़ो के मैगट को किसानों ने स्वयं देखा है व् इसकी वीडियो बनवाई हैं. दीदड़ बुग्ड़े के प्रौढ़ एवं शिशु भी इस चेपे का खून पीकर गुज़ारा करते देखे गये हैं। मोयली नामक सम्भीरका को अपने बच्चे इस चेपे के पेट में पलवाते हुए निडाना के रणबीर मलिक ने खुद के खेत में देखा है. बिराने बालक पालने के चक्कर में यह चेपा तो जमाएँ चेपा जाता है. अपने इन लक्षणों एवं काम के कारण यह मोयली भी फसल में उपलब्ध मुफ्त का एक कीटनाशी हुआ. रणबीर मलिक व् मनबीर रेड्हू तो इस मोयली को पपेवा पेस्टीसाइड कहते है. जी, हाँ! पराये पेट पलने वाला पेस्टीसाइड
Wednesday, August 11, 2010
लोपा मक्खी:- एक परभक्षिया कीटनाशी
लगभग पच्चीस करोड़ साल से इस धरती पर बास कर रही इन किसान मित्र लोपा मक्खियों को विभिन्न देशों में अलग-अलग नजरिये से देखा जाता है। यूरोप व नई दुनियां के देशों में, लोपा मक्खियों को अक्सर बुरी नजर से देखा जाता है। इसीलिये तो इसे "शैतान की सूई, "कान-कटवी", "नरक की घोड़ी", "यमराज की घोड़ी" व 'सापों की सर्जन' आदि जैसे बुराई द्योतक नामों से पुकारा जाता है। जबकि पूर्व एशिया और मूल अमेरिका के लोग इन लोपा मक्खियों को आदरमान के साथ देखते है। कुछ मूल अमेरिकी जनजातियां इन्हे शुद्ध पानी का प्रतीक मानती हैं जबकि अन्य तेज़ी, गतिविधि और नवीकरण का प्रतीक।
जापान में इन लोपा मक्खियों को साहस, शक्ति और खुशी का प्रतीक माना हैं। जापान और चीन में तो इन मक्खियों को पारंपरिक औषधि के रूप में भी प्रयोग किया जाता है।
इंडोनेशिया में इन लोपा मक्खियों के वयस्कों व अर्भकों को तेल में तल कर खाया जाता है।
भारत में इन कीटों को बरसात के आगमन के साथ जोड़ा जाता है। लोपा मक्खियों का जमीन के साथ-साथ मंडराना बरसात की निशानी माना जाता है। इनका आसमान में काफी उच्चे उड़ना धूप निकलने की निशानी व मध्यम उच्चाई पर उड़ना बादल छाने की निशानी माना जाता है। ये मक्खियाँ उडान के दौरान ही सहवास करती है और शिकार भी। ये मक्खियाँ अपने अंडे अमूमन तालाबों, झीलों या धान के खेतों में पानी की सतह पर देती हैं। इन अण्डों से निकलने वाले इनके उदिक निम्फ अपना गुज़ारा पानी में रहने वाले अन्य अकशेरुकीय जीवों को खा कर करते हैं। ये निम्फ सांस गुदा से लेते हैं क्योंकि इनके गलफड़े मलाशय में होते हैं। प्रौढ़ता प्राप्त करने के लिए ये निम्फ नौ-दस बार कांजली उतारते हैं।
लोपा-मक्खियाँ (Dragon Flies) एवं इनके अर्भक खाने के मामले में नकचढ़े नही होते। इन्हें जो भी फंस जाता है, उसे ही खा लेते हैं। इनके भोजन में मक्खी, मच्छर, तितली, पतंगें, मकड़ी व बुगड़े आदि कुछ भी हो सकता है। इन परभक्षियों के भूखड़पन का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि एक प्रौढ़ मक्खी प्रतिदिन अपने वजन से भी ज्यादा मच्छर निगल सकती है। धान की फसल में हानि पहुँचाने वाली तना छेदक व पत्ता-लपेट जैसी सूंडियों के पतंगों का उड़ते हुए शिकार करने में तो माहिर होती हैं ये लोपा। खेत में काम करते हुए किसानों के सिर पर मंडराने के पिछे भी इन मक्खियों का उद्धेश्य शिकार करना ही होता है।
Saturday, July 17, 2010
प्राकृतिक कीटनाशी - कराईसोपा
![]() |
| कराईसोपा का डिंबकः मिलीबग का शिकार। |
| कराईसोपा का प्रौढ़। |
| कराईसोपा का डिंबक। |
हमारे यहाँ फसलों में पाया जाने वाला यह कराईसोपा एक महत्वपूर्ण कीटखोर कीट है। यह हमारी फसलों को हानि पहुँचाने वाले नर्म देह कीड़ों का प्रमुख प्राकृतिक शत्रु है। आमतौर पर इस कीट के प्रौढ़ रात को ही सक्रिय रहते हैं। अँधेरे में रोशनी पर आकर्षित होना इनके स्वभाव में शुमार होता है। हल्कि-हरे रंग की झिल्लीदार पंखों वाला यह कराईसोपा का प्रौढ़ नरम देह प्राणी होता हैं। इसकी धारीदार पारदर्शी पंखों से इसका पतला सा तोतिया रंगी शरीर साफ नजर आता है। कराईसोपा की कुछ प्रजातियों के प्रौढ़ तो मांसाहारी होते हैं जबकि अन्य के परागकण, मधुरस व नैक्टर आदि पर गुजारा करते हैं। कराईसोपा की सभी प्रजातियों के डिंबक मांसाहारी होते हैं। इस कीड़े की मांसाहारी प्रजातियों के प्रौढ़ व सभी प्रजातियों के डिंबक (शिशु) सफेद-मक्खी, तेला, चेपा, चुरड़ा व मिलीबग आदि शाकाहारी कीड़ों के प्रौढ़ों व बच्चों को खाकर जिंदा रहते हैं। ये कीड़े भाँत-भाँत की तरुण सूंडियों का भी भक्षण करते हैं। इस कीट की सिवासण मादाएं प्रजाति अनुसार एक-एक करके या गुच्छों में 600 से 800 तक डंठलदार अंडे देती हैं। अन्य कीटखोरों का शिकार होने से बचने के लिये ही ये अंडे बहुत ही महिन सफेद रंग के रेशमी से डंठलों पर रखे जाते हैँ। अंडों का रंग शुरु में पीला-हरा होता है जो बाद में सफेद तथा फूटने से पहले काला हो जाता है। चार दिन में ही इन अंडों से कराईसोपा के डिंबक निकल आते हैं। ये डिंबक अपने जीवन काल में तीन बार कांजली उतारते हैं। इनके शरीर की लम्बाई 3 से 20 मि.मी. तथा रंग मटमैला-पीला जिसके ऊपर गहरी धारियां भी होती हैं। कराईसोपा के ये डिंबक देखने में तो ऐसे दिखाई देते हैं जैसे कोई मिनी-मगरमच्छ हो। इनके जबड़े देखने में दरांतियों जैसे होते हैं। शिकार का खून चूसने के लिये इन जबड़ों की बदौलत ही शिकार के शरीर में सुराख किया जाता है। निडाना के किसानों ने कपास के खेत में क्राईसोपा के डिम्बक को मिलीबग का शिकार करते हुए मौके पर अनेकों बार देखा है व् इसकी वीडियो बनाई है. इन्होने कांग्रेस घास के पौधों पर भी इस डिम्बक को मिलीबग का सफाया करते देखा है.
| कराईसोपा का अंडा। |
| कराईसोपा का अंडे। |
निडाना गाम के किसानों की तरह अगर आप भी इनकी फसलों के परितंत्र में पाये गये 118 किस्म के मांसाहारी को पहचानने,जानने व् परखने लग जाओ तो आपको भी अपनी फसल में एक छटांक कीटनाशक की जरूरत नही पड़ेगी।
Tuesday, August 18, 2009
कपास में रस चुसक :- अष्टपदी
अष्टपदी या मकडिया-जूं , जिला जींद की कपास फसल में रस चूस कर हानि पहुँचाते पाया जाने लगा है। इस जीव की आठ टाँगे होती हैं इसीलिए तो इसे कीट नही कहा जाता। हाँ! वैज्ञानिकों की दुनिया में इस जीव को "Tetranychus sp." कहा जाता है। ये अष्टपदियाँ Tetranychidae नामक घुन परिवार से सम्बंधित हैं. इस परिवार में इन अष्टपदियों की हज़ार से भी ज्यादा प्रजातियाँ पाई जाती हैं. आमतौर पर ये महीन जीव अपनी सुरक्षा के लिए पत्तों की निचली सतह पर रेशमी जाला बुनती हैं. शायद इसी गुण के कारण इन्हें मकडिया-जूं कहा जाता है. ये अष्टपदियाँ कपास की फसल में पत्तों की निचली सतह से रस चूस कर नुकशान पहुँचाती हैं। आकार में इतनी छोटी (बामुश्किल एक मिलीमीटर) होती हैं कि किसान को मुश्किल से ही दिखाई देती हैं। यूँ तो ये जीव लाल, हरी, सन्तरी या तिनका रंगी होती हैं पर पत्तों की निचली सतह पर धूल कण सी दिखाई देती हैं। सामान्य परिस्थितियों में इनकी जीवन यात्रा 9-10 दिन की होती है ।
गर्म व शुष्क मौसम इनके लिए ज्यादा अनुकूल होता है। याद रहे अष्टपदियाँ पत्तों, तनों व बौकियों से रस चूस कर पौधों को हानि पहुँचाती हैं। इससे पत्तों में क्लोरोफिल की भी कमी हो जाती है। वांछित भोजन ना मिलने के कारण पौधों की स्वाभाविक वृध्दि व् प्रजनन प्रक्रियाएं अवरुद्ध हो जाती हैं। पर स्वभाव से अष्टपदियाँ आक्रामक घुमंतू नही होती. इसका मतलब जिस पत्ते पर जन्म हुआ वहीं या एकाध साथ वाले पत्ते पर गुज़ारा व् प्रजनन कर लिया. चेपों की तरह से इन्हें रसीली फुन्गलों में कोइ दिलचस्पी नही होती.हमारी फसलों में इन को खाने के लिए भान्त-भान्त के कीड़े पाए जाते हैं.
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Monday, August 10, 2009
कपास सेधक कीट - सफ़ेद मक्खी
रस चोर
सफ़ेद मक्खी का जिक्र चलते ही आज पत्ता नहीं क्यों 13 साल पहले 1986 में पढा हुआ यह नारा याद आ गया, "चिट्टे कबूतर ते नीले मोर, सारे चोर - सारे चोर." यह नारा गुरमुखी में लकड़ी जला कर बनाए गये कोयले से बुडैल जेल की एक बैरक में सफ़ेद दिवार पर लिखा हुआ था. इस दृश्य को ताजा करने में सफ़ेद शब्द की भूमिका रही या चोर की या दोनों की यह तो मैं भी तय नहीं कर पाया हूँ. पीले शरीर वाले इस छोटे से कीट की पंखों का रंग सफ़ेद होने के कारण यह सफ़ेद ही दिखाई देता है व पौधों से रस चुराने वाला तो है ही. इसका प्रौढ़ मुश्किल से 1,0 से 1,5 मिलीमीटर लंबा होता है. देखने में यह कीट मक्खी जैसा कम व पतंगे जैसा ज्यादा नजर आता है. इस सफ़ेद मक्खी का असली मक्खियों वाले डिप्टेरा नामक वंश से भी दूर--दूर तक कोई रिश्ता--नाता नहीं. फेर क्यूँ ,अंग्रेजों ने इस कीट का नाम सफेद मक्खी रखा ? -- मेरी समझ तै बाहर सै. अर् अनुवादकों ने भी इसका अनुवाद सफ़ेद मक्खी करके जमाँ--ऐ हिन्दी करण में हद करदी. शायद इसीलिए तो आज भी कपास की फसल में नामलेवा से हानिकारक कीट स्लेटी भुंड को ही सफ़ेद मक्खी समझने वाले किसानों की हरियाणा में कोई कमी नही. इस दुनिया में सफ़ेद मक्खी के कारण फसलों में हर साल होने वाले नुकशान के आंकड़े तो डालरों में आपको कहीं ना कहीं मिल जायेगें पर सफ़ेद मक्खी के नाम पर स्लेटी भुंड को मारने के लिए हरियाणा के किसानों द्वारा हरियाणा के जन्म से लेकर अब तक करोडों रुपये बेमतलब कीटनाशकों पर खर्च किए जाने का आंकडा कहीं नहीं मिलेगा. अब आप ही बताइये कि कीटों व किसानों की इस अंतहीन महाभारत में बिना निजी मुनाफे के क्यों कोई अर्जुन रूपी राणा अपना तीर इस आर्थिक निशाने पर मारेगा?
परिचय :
जीवन--यात्रा:
इस कीट का प्रजनन सारा साल चलता रहता है. इस कीट की प्रौढ़ मादा अपने जीवन काल में सौ--सवासौ अंडे देती है. अंडे पूर्ण खुली हुई फुंगली पत्तियों की निचली सतह पर एक--एक करके दिए जाते हैं. पाँच--छ: दिन के बाद, इन अण्डों से बच्चे निकलते है जिन्हें निम्फ कहा जाता है. निम्फ का आकार इंच का तीसवां हिस्सा ही होता है. ये निम्फ रस चूसने का सही स्थान ढूंढने के लिए ही नाममात्र को चलते है. फ़िर तो एक ही जगह पड़े--पड़े रस चूसते रहते हैं. पॉँच--छ: दिन की इस प्रक्रिया के बाद ये निम्फ स्यूडो--प्यूपा में तब्दील हो जाते हैं. एक सप्ताह में ही स्यूडो--प्यूपा प्रौढ़ के रूप में विकसित हो जाते है. इनका प्रौढिय जीवन आमतौर पर बीस--इक्कीस दिन का होता है.
भोजन श्रृंख्ला:
रस चूस कर गुजारा करने के लिए इस कीट वास्ते धरती पर कपास के अलावा फुल--गोभी, पत्त--गोभी, सरसों, तोरिया, मक्की, आलू, बैंगन, भिन्डी, मिर्च व टमाटर आदि पौधे मौजूद हैं. इसको खाने के लिए फसल--तंत्र में कराइसोपा, ब्रुमस, लेडी बीटल व डैम्सैल मक्खियाँ मौजूद रहती हैं. दीदड़ व् एंथु जैसे विभिन्न मांसाहारी बुगडे भी इनका कल्याण कर डालते हैं.
सफ़ेद मक्खी का जिक्र चलते ही आज पत्ता नहीं क्यों 13 साल पहले 1986 में पढा हुआ यह नारा याद आ गया, "चिट्टे कबूतर ते नीले मोर, सारे चोर - सारे चोर." यह नारा गुरमुखी में लकड़ी जला कर बनाए गये कोयले से बुडैल जेल की एक बैरक में सफ़ेद दिवार पर लिखा हुआ था. इस दृश्य को ताजा करने में सफ़ेद शब्द की भूमिका रही या चोर की या दोनों की यह तो मैं भी तय नहीं कर पाया हूँ. पीले शरीर वाले इस छोटे से कीट की पंखों का रंग सफ़ेद होने के कारण यह सफ़ेद ही दिखाई देता है व पौधों से रस चुराने वाला तो है ही. इसका प्रौढ़ मुश्किल से 1,0 से 1,5 मिलीमीटर लंबा होता है. देखने में यह कीट मक्खी जैसा कम व पतंगे जैसा ज्यादा नजर आता है. इस सफ़ेद मक्खी का असली मक्खियों वाले डिप्टेरा नामक वंश से भी दूर--दूर तक कोई रिश्ता--नाता नहीं. फेर क्यूँ ,अंग्रेजों ने इस कीट का नाम सफेद मक्खी रखा ? -- मेरी समझ तै बाहर सै. अर् अनुवादकों ने भी इसका अनुवाद सफ़ेद मक्खी करके जमाँ--ऐ हिन्दी करण में हद करदी. शायद इसीलिए तो आज भी कपास की फसल में नामलेवा से हानिकारक कीट स्लेटी भुंड को ही सफ़ेद मक्खी समझने वाले किसानों की हरियाणा में कोई कमी नही. इस दुनिया में सफ़ेद मक्खी के कारण फसलों में हर साल होने वाले नुकशान के आंकड़े तो डालरों में आपको कहीं ना कहीं मिल जायेगें पर सफ़ेद मक्खी के नाम पर स्लेटी भुंड को मारने के लिए हरियाणा के किसानों द्वारा हरियाणा के जन्म से लेकर अब तक करोडों रुपये बेमतलब कीटनाशकों पर खर्च किए जाने का आंकडा कहीं नहीं मिलेगा. अब आप ही बताइये कि कीटों व किसानों की इस अंतहीन महाभारत में बिना निजी मुनाफे के क्यों कोई अर्जुन रूपी राणा अपना तीर इस आर्थिक निशाने पर मारेगा?परिचय :
खिद्दवा से इस रस चूसक की गिनती अमेरिकन कपास की फसल में हानि पहुँचाने वाले खतरनाक कीटो में होती है. रस चूसने के अलावा भी यह कई तरह से अपने आश्रयदाता को नुकशान पहुँचाता है.
एक तो इसके मल--मूत्र में मिठास होती है जो पौधों के पत्तों को चीड़-पड़ा कर देती है जिससे प्रकोपित पत्ते निस्तेज होकर मुरझा जाते हैं व पीले पड़ जाते हैं. इस चीड़--पड़े मल--मूत्र पर सूटी--मोल्ड उग आती है. इससे पौधों की भोजन बनाने की प्रक्रिया ही रुक जाती है. दुसरे कपास की फसल में मरोडिया नामक बीमारी के जिम्मेवार वायरस की वाहक भी होती है यह सफ़ेद मक्खी. लीफ कर्ल वायरस का एक पौधे से दुसरे पौधे में संक्रमण इस कीट की लार के मार्फ़त ही होता है.
कीट--वैज्ञानिकों की भाषा में इसको Bemisia tabaci कहा जाता है. इस कीट का कुल Hemiptera वंश में से Aleyrodidae होता है. अपने यहाँ अगर इसका नाम खिद्दवा या मच्छरोड़ होता तो शायद किसानों को भी इसे पहचानने में सहूलियत होती.| Pseudopupa |
इस कीट का प्रजनन सारा साल चलता रहता है. इस कीट की प्रौढ़ मादा अपने जीवन काल में सौ--सवासौ अंडे देती है. अंडे पूर्ण खुली हुई फुंगली पत्तियों की निचली सतह पर एक--एक करके दिए जाते हैं. पाँच--छ: दिन के बाद, इन अण्डों से बच्चे निकलते है जिन्हें निम्फ कहा जाता है. निम्फ का आकार इंच का तीसवां हिस्सा ही होता है. ये निम्फ रस चूसने का सही स्थान ढूंढने के लिए ही नाममात्र को चलते है. फ़िर तो एक ही जगह पड़े--पड़े रस चूसते रहते हैं. पॉँच--छ: दिन की इस प्रक्रिया के बाद ये निम्फ स्यूडो--प्यूपा में तब्दील हो जाते हैं. एक सप्ताह में ही स्यूडो--प्यूपा प्रौढ़ के रूप में विकसित हो जाते है. इनका प्रौढिय जीवन आमतौर पर बीस--इक्कीस दिन का होता है.
भोजन श्रृंख्ला:
रस चूस कर गुजारा करने के लिए इस कीट वास्ते धरती पर कपास के अलावा फुल--गोभी, पत्त--गोभी, सरसों, तोरिया, मक्की, आलू, बैंगन, भिन्डी, मिर्च व टमाटर आदि पौधे मौजूद हैं. इसको खाने के लिए फसल--तंत्र में कराइसोपा, ब्रुमस, लेडी बीटल व डैम्सैल मक्खियाँ मौजूद रहती हैं. दीदड़ व् एंथु जैसे विभिन्न मांसाहारी बुगडे भी इनका कल्याण कर डालते हैं.
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Wednesday, August 5, 2009
प्राकृतिक कीटनाशी - दीदड़ बुगडा
| दीद्ड़ बुगड़ा का प्रौढ़ |
पहचान:
![]() |
| दीद्ड़ बुगड़ा का निम्फ |
निम्फ अपने प्रौढों जैसे ही होते है। बस प्रौढों की तरह निम्फों के
पंख नहीं होते।
खान पानः
यह कीट शारीरिक तौर पर जितना छोटा होता है, शिकारी के तौर पर उतना ही खोटा होता है। इस कीट में उपर - नीचे व अगल - बगल में तेज़ी से घूमने की काबिलियत होती है। इस गजब की चाल के कारण ही यह कीट उम्दा किस्म का आखेटक होता है। इस कीट के निम्फ व प्रौढ़, दोनों ही, कुटकियों, चेप्पों व पौधों की पत्तियों पर पाए जाने वाले फुदकों का खून चूस कर अपना गुजारा करते हैं। ये बुगडे़ छोटी - छोटी इल्लियों, मकड़ीनुमा कुटकियों व पिस्सूआ बीटलों का भी खून पीते हैं। ये दीदड़ बुगडे़ सुई जैसी अपनी डंक की मदद से विभिन्न कीटों के अण्डों से जीवन-रस चूसने के तो विशेषज्ञ होते हैं। अंडे चाहे अमेरिकन सुंडी के हों, चित्तकबरी सुंडी के हों, गुलाबी सुंडी के हों, भुन्डों के हों, बीटलों के हों या किसी भी कीट के हों - इनके भोजन का मुख्य हिस्सा होते हैं।
यह कीट शारीरिक तौर पर जितना छोटा होता है, शिकारी के तौर पर उतना ही खोटा होता है। इस कीट में उपर - नीचे व अगल - बगल में तेज़ी से घूमने की काबिलियत होती है। इस गजब की चाल के कारण ही यह कीट उम्दा किस्म का आखेटक होता है। इस कीट के निम्फ व प्रौढ़, दोनों ही, कुटकियों, चेप्पों व पौधों की पत्तियों पर पाए जाने वाले फुदकों का खून चूस कर अपना गुजारा करते हैं। ये बुगडे़ छोटी - छोटी इल्लियों, मकड़ीनुमा कुटकियों व पिस्सूआ बीटलों का भी खून पीते हैं। ये दीदड़ बुगडे़ सुई जैसी अपनी डंक की मदद से विभिन्न कीटों के अण्डों से जीवन-रस चूसने के तो विशेषज्ञ होते हैं। अंडे चाहे अमेरिकन सुंडी के हों, चित्तकबरी सुंडी के हों, गुलाबी सुंडी के हों, भुन्डों के हों, बीटलों के हों या किसी भी कीट के हों - इनके भोजन का मुख्य हिस्सा होते हैं।
क्रिप्टोलेमस, ब्रुमस व नेफस जैसी किसान हिमायती छोटी - छोटी बीटलों का शिकार करने में भी इनको कोई गुरेज़ नहीं होता। "बूढा मरो या जवान - हत्या सेती काम" किसानों का दोस्त फंसे या दुश्मन - इस बात से इन बुगडों को कोई मतलब नहीं होता। बस इन्हें तो अपना पेट भरने से मतलब होता है वो किसी के खून से भर जाए- कोई बात नही। कपास की फसल में मिलीबग पाए जाने पर इन बुगडों के निम्फों व प्रौढों के ठाठ हो जाते हैं। कपास की फसल में मिलीबग का खून चूसते हुए इस दीदड़ बुगडे की वीडियो निडाना के किसानों ने बनाई है। देखना या ना देखना, मर्जी आपकी। प्रकृति में खाने और खाए जाने के अदभुत खेल के खिलाड़ी भी हैं ये बुगडे। पर हमारे फसल- तंत्र में इनको खाने वाले कम तथा इन द्वारा खाए जाने वाले अधिक हैं। इसीलिए तो इन दीदड बुगडों की गिनती किसानों की कीट-नियंत्रण में सहायता करने वाले उम्दा हिमायतियों में होती है। किसानों व कीटों को इस बात की जानकारी है या नहीं, ये जानकारी तो हमेँ भी नहीं।
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Monday, June 1, 2009
फंगिरा -एक परजीव्याभ सम्भीरका
फंगिरा जिला जींद में किसानों द्वारा देखी गई एक परजीव्याभ सम्भीरका है। है तो बहुत छोटी पर कपास की फसल का भस्मासुर कहे जाने वाले रस चुसक कीट मिलीबग को प्राकृतिक तौर पर काबू करने में महती भूमिका निभाती है। इस को अंग्रेज किस नाम से पुकारते हैं- हमें नही मालूम। कीट विज्ञानं की भाषा में इसका नाम, खरना, कुनबा व् प्रजाति आदि भी- हमें नही मालूम। पर हमें यह अच्छी तरह से पता है कि Hymenoptera वंशक्रम की यह फंगिरा नामक सम्भीरका अपने बच्चे मिलीबग के पेट में पलवाती है। वंशवृद्धि के इस असाधारण कार्य हेतु इन्हें असाधारण कौशल की जरुरत होती है। आवश्यकता अनुसार भोजन उपलब्ध होने पर इसके नवजातों को पूर्ण विकसित होने के लिए 15 -16 दिन का समय लगता है। इसीलिए इसकी प्रौढ़ मादा को अंडा देने के लिए ऐसे स्वस्थ मादा मिलीबग की तलाश रहती है जिसका जीवन अभी 18 -20 दिन का और बकाया हो। यह सम्भीरका एक-एक करके सौ से ज्यादा मिलिबगों के पेट में अंड-निक्षेपण करती है। मिलीबग के पेट में अंडे से निकलते ही इस सम्भीरका के नवजात मिलीबग को अन्दर-अन्दर ही खाना शुरू करते हैं। यह प्रक्रिया आरम्भ होते ही मिलीबग पौधों से रस पीना तो छोड़ देता है पर ना तो इसके शारीर से आटानुमा पाउडर उड़ता है और ना ही यह रंग बदलता है। मतलब ऊपर से देखने पर प्रकोपित मिलीबग सामान्य ही दिखाई देता है। इस भली सी सम्भीरका की अंडे से लेकर प्रौढ़ तक की सभी अवस्थाएं मिलीबग के पेट में ही पूरी होती हैं। पर प्रौढ़ सम्भीरका अपना स्वतंत्र जीवन जीने के लिए हमेशा मिलीबग की कमर में सुराख़ करके ही बाहर निकलती है। इस प्रक्रिया में मिलीबग को मिलती है-मौत। यही तो किसान चाहते हैं। मिलीबग को ख़त्म करने के लिए किसान कीटनाशकों का इस्तेमाल भी इसीलिए करते हैं। अगर हम सभी को यह अच्छी तरह से जानकारी हो जाये कि मिलीबग को काबू करने के लिए अन्य कीटों के साथ-साथ फंगिरा नामक यह परजीव्याभ सम्भीरका भी हमारी फसलों में मौजूद है तो क्यों कोई किसान किसी कीटनाशक का प्रयोग करेगा?
Monday, May 11, 2009
सुन्दरो: एक प्राकृतिक कीटनाशी
है। पेट पर निंगाह पड़ते ही ततैये जैसा दिखाई नजर आने लगता है। ऐसे में लालित खेड़ा की कविता ने इस कीट को सुन्दरो कह दिया तो क्या जुर्म कर दिया। अब यहाँ के किसान इस कीड़े को सुन्दरो के नाम से ही जानते हैं। लेकिन अंग्रेज लोग तो इसे owlfly के नाम से जानते हैं। जबकि इसका ना तो उल्लू से कोई वास्ता ओर ना ही मक्खियों से कोई रिश्ता। जारजटिया वंश से तालुक रखने वाले Ascalaphidae परिवार का यह कीटभक्षी खेतों में फसलों के ऊपर उड़ता दिखाई देता है। दे भी क्यों नही! चम्बो को उड़ते हुए ही शिकार जो करना पड़ता है। शिकार अपने हाण के या अपने से छोटे कीट का ही आसानी से किया जा सकता हैं। इनके भोजन में भान्त-भान्त की पौधाहारी सुंडियों के प्रौढ़ पतंगे एवं तितलियाँ, भान्त-भान्त के भूंड एवं भँवरे, भुनगे -फुदके आदि कीट शामिल होते हैं। जो फंस गया उसी से पेट भर लिया। मतलब भोजन के मामले में सुन्दरो नकचढ़ी बिलकुल नही होती। चलताऊ नजर से देखने पर तो चम्बो के ये प्रौढ़ आराम करते हुए बने-बनाये लोपा मक्खी जैसे ही दिखाई देते हैं। पर जरा गौर से निंगाहते ही इसके ढूंढ़रूदार लम्बे-लम्बे एंटीने नजर आने लगते हैं। जो लोपा मक्खियों से मेल नहीं खाते। पर आराम करते हुए इनका बैठने का ढंग लोपा मक्खियों से मेल खाता है। शिकारियों से बचने के लिए ही बैठने के मामले में चंबो खाड़कू लोपा मक्खियों की नकल करती हैं।
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