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Wednesday, July 27, 2011

सड़ांधला हरिया:- कपास में एक बुग्ड़ा!



सड़ांधला हरिया कपास के खेत में अक्सर दिखाई दे जाने वाला एक पौधाहरी बुग्ड़ा है जो पौधों का जीवन-रस पीकर अपना गुजारा करता है व् अपनी वंश-बेल चलाने के प्रयास करता है. इस चक्कर में कपास की फसल को थोडा-बहुत नुकशान भी हो जाये तो, इसे कोंई परवाह भी नही. पर हरियाणा में कपास की फसल में इस कीट ने कभी कोंई नुकशान पहुचाया हो, ऐसी कोंई भी ऍफ़.आई.आर. किसी कीट- वैज्ञानिक ने दर्ज नही करवाई. और तो और इस सड़ांधले बुग्ड़े की गिनती तो कपास के नामलेवा हानिकारक कीटों में भी नही होती. वास्तव में तो यह सड़ांधला हरिया मक्का, सोयाबीन व् कपास समेत किसी भी पौधे का रस चूस कर गुज़ारा कर लेता है. ये बुग्ड़े तना, पत्ते, फुल, फल व् बीज समेत पौधे के किसी भी भाग से रस चूस लेता है. सड़ांधले बुग्ड़े इस काम को अपने नुकीले डंक के कारण ही कर पाते हैं.
कीट वैज्ञानिक इस सड़ांधले बुग्ड़े को नामकरण की द्विपदी प्रणाली के मुताबिक  Acrosternum hilare कहते हैं. इसके परिवार का नाम Pentatomidae व् वंशक्रम का नाम Hemiptera.        
इस बुग्ड़े के प्रौढ़ एवं निम्फ, दोनों ही इनके साथ छेड़खानी होने पर अपने शारीर से दुर्गन्धयुक्त तरल निकालते हैं. शायद इसीलिए इन्हें सड़ांधले बुग्ड़े कहा जाता है. 
अंडे से प्रौढ़ के रूप में विकसित होने के लिए सड़ांधले बुग्ड़े को 30 से 35 दिन का समय लग जाता है. इनका प्रौढीय जीवन 60 दिन के लगभग होता है.
कपास की फसल में इस कीट का भक्षण करते हुए भान्त-भान्त के पक्षियों व् मकड़ियों को जिला जींद के रूपगढ, ईगराह, निडाना, निडानी, ललित खेडा व् भैरों खेडा के किसानों ने अपनी आँखों से देखा है. इन किसानों ने तो इस सड़ांधले बुग्ड़े के अण्डों में अपने बच्चे पलवाते एक महीन सम्भीरका को भी देख लिया.




Monday, March 7, 2011

घूँघटिया कपास (bt cotton) में शहद की देसी मक्खी !!!




जिला जींद के ज्यादातर किसानों की तरह निडाना निवासी पंडित चन्द्र पाल ने भी अपने खेत में एक एकड़ बी.टी.कपास लगा रखी है। इस कपास की फसल में देसी शहद की मक्खियों (Apis indica) ने अपना छत्ता बना कर डेरा जमा रखा है। एक महिना पहले जब पंडित जी ने इस छाते को देखा तो खुशी के मारे उछल पड़ा था। उछले भी क्यों ! चन्द्र पाल ने एक लंबे अरसे के बाद देसी शहद की मक्खियों का छत्ता देखा था, वो भी ख़ुद के खेत में। वह तो यह समझे बैठा था कि फसलों में कीटनाशकों के इस्तेमाल के चलते शहद की इन हिन्दुस्तानी मक्खियों का हरियाणा से सफाया हो चूका है. इसीलिए वह इस विशेष जानकारी को घरवालों पड़ोसियों से बांटने के लिएअपने आप को रोक नहीं पाया था। चाह ऎसी ही चीज होती है। इसी चक्कर में, पंडित जी ने रोज खेत में जाकर इस छत्ते को संभालना शुरू कर दिया। कुछ दिन के बाद उसका ध्यान इस बात की तरफ भी गया कि ये मक्खियाँ इस खेत में कपास के फूलों पर नहीं बैठ रही। मज़ाक होने के डर से उन्होंने हिच्चकते--हिच्चकते अपनी इस बा को गावं के भू.पु.सरपंच रत्तन सिंह से साझा किया. दोनों ने मिलकर इस बात को लगाता ती दिन तक जांचा परखा मन की मन में लिए, रत्तन सिंह ने इस वस्तुस्थिति को अपना खेत अपनी पाठशाला के बाहरवें सत्र में किसानों के सामने रखा। तुंरत इस पाठशाला के 23 किसान डा.सुरेन्द्र दलाल कपास के इस खेत में पहुंचे। आधा घंटा खेत में माथा मारने के बावजूद किसी को भी कपास के फूलों पर एक भी मक्खी नजर नहीं आई। यह तथ्य सभी को हैरान कर देने वाला था। बी.टी.टोक्सिंज, कीटों की मिड-गट की पी.एच.,व कीटों में इस जहर का स्वागती-स्थल आदि के परिपेक्ष में इस तथ्य पर पाठशाला में खूब बहस भी हुई। पर कोई निचोड़ ना निकाल सके. हाँ! डा.सुरेन्द्र दलाल ने उपस्थित किसानों को इतनी जानकारी जरुर दे दी की उसने स्वयं अपनी आँखों से पिछले वीरवार को ललित खेडा से भैरों खेडा जाते हुए सड़क के किनारे एक झाड़ी पर इन देसी शहद की मक्खियों को देखा है। देसी झाड़ के छोटे--छोटे फूलों पर इन मक्खियों को अपने भोजन शहद के लिए लटोपिन हुए देखने वालों में भैरों खेडा का सुरेन्द्र, निडाना का कप्तान पटवारी रोहताश भी शामिल थे। 
   भैरों खेडा के लोगों ने तो शहद की इस हिन्दुस्तानी मक्खी को आखटे के फूलों से शहद इक्कठा करते भरी   दोपहरी में भी देखा है. इस तथ्य को हम विश्लेषण हेतु इंटरनेट के मध्यम से जनता के दरबार में प्रस्तुत कर रहे हैं।
इस मैदानी हकीकत से निडाना में अनावरण यात्रा पर आयी कृषि-अधिकारीयों व्  वैज्ञानिकों की टीम भी रूबरू हुई. पर देसी शहद की मक्खियों के इस अनेपक्षित व्यव्हार की व्याख्या किसी के पास नही थी.
                                                                                                                                               

Friday, August 6, 2010

छैल-मक्खी - एक परभक्षिया कीटनाशी

छैल मक्खी अन्य छैल को खाते हिए।
आराम फरमाती छैल मक्खी
 छैल-मक्खी (Damsel fly) चौमासे (आमतौर पर जून, जुलाई और अगस्त) के दौरान विभिन्न फसलों में उड़ते हुए नजर आने वाली एक महत्वपूर्ण कीटखोर मक्खी है। हरियाणा में इसे तुलसा के नाम से जाना जाता है। लंबे, संकरे व पारदर्शी पंखों वाली ये मक्खियाँ कई रंगों में पाई जाती हैं। इन्हें लोपा-मक्खियों (Dragon flies) के मुकाबले कमजोर उड़ाकू माना जाता है। उड़ने की प्रतियोगिता में उपरोक्त कीटों की हार-जीत से किसानों का क्या लेना-देना। किसानों के लिये तो यह जानकारी फायदेमंद है कि इस छैल-मक्खी के प्रौढ़ व अर्भक, दोनों ही मांसाहारी होते है। यह मक्खी अपने अंडे खड़े पानी में देती है। पानी चाहे गावं के जोहड़ या जोहड़ी में हो या फिर धान के खेत में हो। इस कीड़े के अर्भक पानी में पाये जाने वाले मच्छर के लार्वा समेत उन अन्य सभी कीटों का शिकार कर लेते हैं जो आकार में इनके बराबर या छोटे हों। धान की फसल को हानि पहूँचाने वाले विभिन्न फुदकों का शिकार करने में इन्हें बहुत आनंद आता है। वैसे तो इस कीट के अर्भक पानी में रहते हैं लेकिन खाने के लिए अन्य कीड़ों की तलाश में धान के पौधों पर चढ़ने में इन्हें गुरेज नही होता। इस मक्खी की कुछ प्रजातियाँ तो मकड़ियों को भी खा जाती हैं, मकड़ी के जाले के पास मँडराते- मँडराते ही जाले में से मकड़ी को दबोच लेती हैं। भोजन के लिये अन्य कीड़ों का अभाव होने पर यह मक्खियाँ आपस में ही एक दूसरे को खा जाती हैं। शायद भोजन में इतनी विविधता के कारण ही भोजन श्रृंखला में इन्हे उच्चा दर्जा हासिल है।
आराम फरमाती छैल मक्खी।
रति रत जोड़े।
आराम

Tuesday, August 25, 2009

कपास का शाकाहारी कीट - चित्तकबरी सुंडी



 कुछ साल पहले तक हरियाणा प्रदेश में चितकबरी सूंडी कपास की फसल
 का मुख्य हानिकारक कीट होती थी। पर आजकल यह सूंडी कपास की 
फसल में बहुत कम दिखाई देती है। यह सूंडी पै समय का कहर है। या व्यापार का दोपहर है।। - कुछ कह नही सकते। हाँ, इतना जरुर है कि हरियाणा में किसान इस सूंडी को काला कीड़ा, धब्बेदार सूंडी व गोभ वाली सूंडी आदि नामों से जानते व पहचानते हैं। हमारे यहाँ कपास की फसल में इस कीड़े की दो प्रजातियाँ पाई जाती हैः इयरिआस विटैला और इयरिआस इन्सुलाना। इयरिआस विटैला नमी वाले मौसम में ज्यादा पाई जाती है तथा इयरिआस इन्सुलाना खुसकी वाले मौसम में ज्यादा पाई जाती है। इन कीट पंतगों की सिवासण पौधों के पत्तों, शाखाओं एवं फलीय भागों जैसे रोयेदार हिस्सों पर एक-एक करके 200 से 400 तक अण्डे देती हैं। इन अंडों का रंग हल्का नीला होता है। सामान्य परिस्थितियों में इन अंडों से तीन चार दिन बाद नन्ही सूंडियाँ निकलती हैं जो कपास के पौधों की गोभ व फलीय हिस्सों पर हमला करती हैं। जिस कारण गोभ मुरझाकर सूख जाती हैं, बौकी व फूल झड़ जाते हैं, ग्रसित टिंडे समय से पहले खिल जाते हैं तथा टिंडों में फौहा खराब हो जाता है। इस कीड़े की लार्वल अवस्था तकरीबन 10 से 16 दिन की होती है। इसके बाद यह सूंडी प्यूपा बन जाती है। इस कीड़े की यह प्यूपीय अवस्था पौधे के विभिन्न भागों, झड़ी हुई बौकियों व अन्य अवशेषों पर लगभग 4 से 9 दिन में पूरी हो जाती है। इस प्यूपा से प्रौढ़ पतंगे निकलते हैं जो 8 से 20 दिन तक जीवित रहते हैं।

ये पतंगे रात को ही सक्रिय रहते हैं. रात को ही नर-मादा का मधुर मिलन होता है तथा रात को ही अंड-निक्षेपण. दिन में तो इन्हें छुपकर रहना होता है. अन्यथा लोपा मक्खी व् डायन मक्खी इनका उड़ते हुए ही काम तमाम कर देती है. इस कीट के प्रौढ़ों व् सुंडियों के लिए घात लगा कर बैठे भान्त-भान्त(दिद्ड बुग्ड़ा, कातिल बुग्ड़ा, सिंगू बुग्ड़ा, बिन्दुवा बुग्ड़ा, एंथू बुग्ड़ा) के बुग्ड़े भी कपास के खेत में किसानों ने देखे हैं. ये मांसाहारी बुग्ड़े इस कीट के अण्डों से जीवन-रस पीने में भी माहिर होते हैं.