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Thursday, August 23, 2012

मुद्रो - एक कीटनाशी कीट

प्रौढ़ मुद्रो 

 जारजटिया वंश से तालुक रखने वाला यह कीटभक्षी निडाना के खेतों में सुबह या शाम को फसलों के ऊपर उड़ता दिखाई देता है। दे भी क्यों नही! मुद्रो को उड़ते हुए ही शिकार जो करना पड़ता है। शिकार अपने हाण के या अपने से छोटे कीट का ही आसानी से किया जा सकता हैं। इनके भोजन में भान्त-भान्त की पौधाहारी सुंडियों के प्रौढ़ पतंगे एवं तितलियाँ, भान्त-भान्त के भूंड एवं भँवरे, भुनगे -फुदके आदि कीट शामिल होते हैं। जो फंस गया उसी से पेट भर लिया। मतलब भोजन के मामले में मुद्रो नकचड़ी बिलकुल नही होती। चलताऊ नजर से देखने पर तो मुद्रो के ये प्रौढ़ बने-बनाये लोपा मक्खी जैसे ही दिखाई देते हैं। पर जरा गौर से निंगाहते ही इसके ढूंढ़रूदार लम्बे-लम्बे एंटीने नजर आने लगते हैं। जो लोपा मक्खियों से मेल नहीं खाते। आराम करते हुए इनका बैठने का ढंग भी लोपा मक्खियों से मेल नही खाता। एंटीने व् पंख टहनी के सामांतर तथा शरीर लम्वत- शिकारियों से बचने के लिए लाजवाब छलावरण
                        यह कीट अपने अंडे पौधों की डालियों पर या फिर जमीन पर ड्लियों के निचे रखते हैं। मौसम की अनुकूलता अनुसार अंडों से 5-6 दिन में लारवे निकलते हैं जो अन्य छोटे-छोटे कीटों को खा पीकर ही पलते-बढते हैं। इस कीट के ये लारवे घात लगाकर शिकार करते हैं। अपना पेट भरने के लिए इस कीट के लारवे व् प्रौढ़ों का दूसरे कीटों पर निर्भर रहना ही इन्हें प्राकृतिक कीटनाशी के रूप में अपना वजूद कायम करने के लिए काफी है। मगर इस आपाधापी व् बिसराण के बाजारू युग में किसे फुरसत है विषमुक्त खेती के लिए इनके इस लाजवाब कार्य को परखने व् मान्यता देने की।

Saturday, July 30, 2011

प्राकृतिक कीटनाशी - बिन्दुआ बुग्ड़ा

बिन्दुआ बुग्ड़ा एक मांसाहारी कीट है जो अपना गुजर-बसर दुसरे कीटों का खून चूस कर करता है। कांग्रेस घास पर यह कीट दुसरे कीटों की तलाश में ही आया है। कांग्रेस घास के पौधों पर इसे मिलीबग, मिल्क-वीड बग़जाय्गोग्राम्मा बीटल आदि शाकाहारी कीट व इनके शिशु व अंडे मिल सकते है। इस घास पर इन्हें खून पीने के लिए इन शाकाहारी कीटों के अलावा कीटाहारी कीट भी मिल सकते है। इन सभी मध्यम आकार के कीटों का खून चूस कर ही बिन्दुआ बुग्ड़ा व इसके बच्चों का कांग्रेस घास पर गुज़ारा हो पाता है।
स्टिंक बग़ की श्रेणी में शामिल इस बिन्दुआ बुगडा को अंग्रेज "two spotted bug" कहते हैं। कीट वैज्ञानिक इसे द्विपदी प्रणाली के मुताबिक "Perillus bioculatus" कहते हैं। इस बुग्ड़े के परिवार का नाम "Pentatomidae" है तथा वंश-क्रम "Hemiptera" है.
बिन्दुवा बुग्ड़े का निम्फ

अंडे 
इन बिन्दुआ बुग्ड़ों का शरीर चौड़ा व शिल्ड्नुमा होता है। इनकी पीठ पर ध्यान से देखे तो अंग्रेजी का वाई अक्षर भी नज़र आ जाता है. इनके प्रौढ़ों के शरीर की लम्बाई 10 से 12 मिमी तक होती है। इनके निम्फ 8 से 9 मिमी लंबे होते है. निम्फों के शरीर का रंग पीला-पीला या लालिया संतरी होता है. इस बुग्ड़े की प्रौढ़ मादा मधुर मिलन के बाद प्राय: दो दर्जन अंडें पत्तियों के उपरली सतह या टहनियों पर देते हैं. इन अण्डों को वे दो पंक्तियों में एक-दुसरे से सटा कर रखते हैं. इन अण्डों से छ:-सात दिन में निम्फ निकलते है. अंडे से प्रौढ़ विकसित होने में तक़रीबन 25 -30 दिन का समय लगता है.
बिन्दुवा बुग्ड़े के अंडे से निकला- बंगिरा
इंसानों द्वारा छेड़े जाने पर ये बिन्दुआ बुग्ड़े बेचैन करने वाली तीक्ष्ण गंध छोड़ते हैं। इस गंध रूपी हथियार को ये कीट दुसरे कीटों से अपना बचाव करने में भी इस्तेमाल करते हैं। आलू की फसल को नुकशान पहुचने वाली कोलोराडो बीटल के तो ग्राहक होते है ये बिन्दुआ बुग्ड़े। इस बुग्ड़े के नवजात पहली कांजली उतारने तक तो पौधों का जूस पीकर गुजारा करते हैं. इसके बाद तो ताउम्र मांसाहारी रहते हैं. कीट वैज्ञानिक बताते हैं कि ये निम्फ प्रौढ़ विकसित होने तक तक़रीबन इस बीटल के 300 अंडे, 4 लार्वे व् 5 प्रौढ़ डकार जाते हैं. प्रौढ़ जीवन जीने के लिए प्रतिदिन दो के लगभग बीटल के लार्वा तो मिलने ही चाहियें. इसी जानकारी का फायदा उठाकर कीटनाशी उद्योग द्वारा इन बुग्ड़ों को भी जैविक-नियंत्रण के नाम पर बेचा जाने लगा है। साधारण से साधारण जानकारी को भी मुनाफे में तब्दील करना कोई इनसे सीखे। साधारण ज्ञान को विज्ञानं बनाकर तथा फिर इसे तकनिकी बताकर ये कीटनाशी उद्योग किसानों को तो बेवकूफ बना सकते है पर प्रकृति को नही. जिला जींद के निडानी गावं की खेत पाठशाला के किसानों संदीप व् राजेश तथा खेती विरासत मिशन, जैतों(पंजाब) के गुरप्रीत, अमनजोत, बलविन्द्र व् अमरप्रीत ने कीट-कमांडो रणबीर मलिक व् कप्तान के नेतृत्त्व में कांग्रेस घास पर मेक्सिकन बीटल के गर्ब का खून चूसते हुए इस बुग्ड़े के निम्फ को मौके पर देखा व् फोटो खीचा. इन्होने इस बुग्ड़े के प्रौढ़ एवं निम्फ की मेक्सिकन बीटल के बच्चे का परभक्षण करते हुए विडिओ तैयार की. इसी गावं के खेतो में रजबाहे के किनारे खड़े कांग्रेस घास के पत्तों पर कीट-कमांडो रणबीर मलिक ने इस बिन्दुवा बुग्ड़े के अण्डों से एक परजीव्याभ निकलते देख लिया. यहाँ के किसानों ने मिलीबग के परजीव्याभों अंगीरा, जंगिरा व् फंगिरा की तर्ज़ पर बंगिरा नाम दिया है.
किसी ने सच ही कहा है, "जी का जी बैरी". कांग्रेस घास को उपभोग करती है मेक्सिकन बीटल और उसके बच्चे. बिन्दुआ बुग्ड़े मेक्सिकन बीटल और उसके बच्चे को खा-पीकर गुजारा करते है. बंगिरा अपने बच्चे इन बिन्दुआ बुग्ड़ों के अण्डों में पालता है.
काश! हरियाणा के सभी किसान इस प्राकृतिक कीटनाशी को पहचानते होते तो वे भी रणबीर, मनबीर व् इनके साथियों की तरह कीटनाशी मुक्त खेती कर रहे होते.

Friday, August 6, 2010

छैल-मक्खी - एक परभक्षिया कीटनाशी

छैल मक्खी अन्य छैल को खाते हिए।
आराम फरमाती छैल मक्खी
 छैल-मक्खी (Damsel fly) चौमासे (आमतौर पर जून, जुलाई और अगस्त) के दौरान विभिन्न फसलों में उड़ते हुए नजर आने वाली एक महत्वपूर्ण कीटखोर मक्खी है। हरियाणा में इसे तुलसा के नाम से जाना जाता है। लंबे, संकरे व पारदर्शी पंखों वाली ये मक्खियाँ कई रंगों में पाई जाती हैं। इन्हें लोपा-मक्खियों (Dragon flies) के मुकाबले कमजोर उड़ाकू माना जाता है। उड़ने की प्रतियोगिता में उपरोक्त कीटों की हार-जीत से किसानों का क्या लेना-देना। किसानों के लिये तो यह जानकारी फायदेमंद है कि इस छैल-मक्खी के प्रौढ़ व अर्भक, दोनों ही मांसाहारी होते है। यह मक्खी अपने अंडे खड़े पानी में देती है। पानी चाहे गावं के जोहड़ या जोहड़ी में हो या फिर धान के खेत में हो। इस कीड़े के अर्भक पानी में पाये जाने वाले मच्छर के लार्वा समेत उन अन्य सभी कीटों का शिकार कर लेते हैं जो आकार में इनके बराबर या छोटे हों। धान की फसल को हानि पहूँचाने वाले विभिन्न फुदकों का शिकार करने में इन्हें बहुत आनंद आता है। वैसे तो इस कीट के अर्भक पानी में रहते हैं लेकिन खाने के लिए अन्य कीड़ों की तलाश में धान के पौधों पर चढ़ने में इन्हें गुरेज नही होता। इस मक्खी की कुछ प्रजातियाँ तो मकड़ियों को भी खा जाती हैं, मकड़ी के जाले के पास मँडराते- मँडराते ही जाले में से मकड़ी को दबोच लेती हैं। भोजन के लिये अन्य कीड़ों का अभाव होने पर यह मक्खियाँ आपस में ही एक दूसरे को खा जाती हैं। शायद भोजन में इतनी विविधता के कारण ही भोजन श्रृंखला में इन्हे उच्चा दर्जा हासिल है।
आराम फरमाती छैल मक्खी।
रति रत जोड़े।
आराम

Wednesday, July 29, 2009

प्राकृतिक कीटनाशी - डायन मक्खी

टिड्डे का शिकार करती डायन मक्खी।
जिला जींद के फसलतंत्र में किसान मित्र के रूप में डायन मक्खी भी पाई जाती हैं. जी, हाँ! , राजपुरा ईगराह रूपगढ, निडाना व ललित खेडा के किसान तो इसे इसी नाम से जानते हैं जबकि अंग्रेज इसे Robber Fly कहते हैं. नामकरण की द्विपदी प्रणाली के अनुसार यह डायन मक्खी, Dipterans के Asilidae परिवार की Machimus प्रजाति है.
डायन मक्खी घोर अवसरवादी एवं प्रभावशाली परभक्षी होती है. डायन मक्खी के ये गुण इसके शारीरक ढांचे में निहित होते हैं. इन मक्खियों की टांगें काफी मजबूत होती हैं. ऊपर से इन पर कसुते कांटे होते हैं. इनके माथे पर दो जटिल एवं विशाल आँखों के मध्य खास खड्डे में तीन सरल आँखें भी होती हैं. अपनी इन आँखों व् टांगों के कारण ही ये मक्खियाँ शिकार का कोई अवसर हाथ से नही जाने देती. इनके चेहरे पर कसुते करड़े बालों वाली मुच्छ होती हैं जो मुठभेड़ के समय इनके बचाव के काम आती हैं.
टिड्डे को बेहोश करती डायन मक्खी।
 शिकार फांसने के लिए लुटेरों जैसी रणनीति के कारण ही शायद इन्हें डायन या डाकू मक्खी कहा जाने लगा. डायन  मक्खी अपने अड्डे से शिकार करती हैं. ये  मक्खी अपना अड्डा खुली एवं धुप वाली जगह बनाती हैं. अड्डे की जगह पौधों की टहनी, ठूंठ,  पत्थर व ढेला आदि कुछ भी हो सकती है. इस मचान पर बैठ कर ही यह मक्खी अपने शिकार का इंतजार करती रहती है. यहाँ से गुजरने वाले शिकार पर झपटा मरने के लिए इस मचान से उड़ान भरती हैं. कीट वैज्ञानिकों का कहना हैं कि यह डायन मक्खी अपनी टोकरिनुमा कांटेदार टांगों से ही उड़ते हुए कीटों को काबू करती हैं. हमने तो इस मक्खी को कई बार जमीन पर बैठे - बिठाए टिड्डों को भी झपटा मार कर अपनी गिरफ्त में लेते हुए देखा है.
टिड्डे का खून पिते हुए डायन मक्खी।
शिकार को पकड़ते ही, डायन अपना डंक उसके शरीर में घोपती है व इस डंक के जरिये ही वह शिकारी के शरीर में अपनी लार छोड़ती है. इस लार में एक तो ऐसा जहरीला प्रोटीन होता है जो तुंरत कारवाई करते हुए शिकार  के स्नायु- तंत्र को सुन्न करता है तथा दूसरा एक ऐसा पाचक प्रोटीन होता है जो शिकार के शरीर के अंदरूनी हिस्सों को अपने अंदर घोल लेता है. इन घुले हुए हिस्सों को डायन मक्खी ठीक उसी तरह से पी जाती हैं जैसे कोई बड़ा - बुड्डा दूध में दलिया घोल कर पी जाता है.
इनके भोजन में मक्खी, टिड्डे, भुंड, भिरड, बीटल, बग़, पतंगे व तितली आदि कीट शामिल होते हैं. डायन मक्खी कई बार अपने से बड़े जन्नोर का शिकार भी कुशलता से कर लेती हैं.


Tuesday, July 28, 2009

कपास में पुष्प-चर्वक कीट - तेलन

पुष्प पंखुड़ी भक्षण करती - तेलन
पुष्प पुंकेसर भक्षण करती - तेलन
उल्टी काण्ड पर तेलन
यह कीट ना तो तेली की बहु अर् ना इस कीट का तेली से कोई वास्ता फ़िर भी हरियाणा में पच्चास तै ऊपर की उम्र के किसान, अंग्रेजों द्वारा ब्लिस्टर बीटल कहे जाने वाले इस कीट को तेलन कहते हैं। हरियाणा के इन किसानों को यह मालुम हैं कि इस तेलन का तेल जैसा गाढा मूत अगर हमारी खाल पर लग जाए तो फफोले पड़ जाते हैं। इन किसानों को यह भी पता हैं कि पशु-चारे के साथ इन कीटों को भी खा लेने से, हमारे पशु बीमार पड़ जाते हैं। घोडों में तो यह समस्या और भी ज्यादा थी। एक आध किसान को तो थोड़ा-बहुत यह भी याद हैं कि पुराने समय में देशी वैध इन कीटों को मारकार व सुखा कर, इनका पौडर बना लिया करते। इस पाउडर नै वे गांठ, गठिया व संधिवात जैसी बिमारियों को ठीक करने मै इस्तेमाल किया करते। इस बात में कितनी साच सै अर् कितनी झूठ - या बताने वाले किसान जानै या इस्तेमाल करने वाले वैध जी। कम से कम हमनै तो कोई जानकारी नही।
हमनै तो न्यूँ पता सै अक् या तेलन चर्वक किस्म की कीट सै। कीट वैज्ञानिक इस नै Mylabris प्रजाति की बीटल कहते हैं जिसका Meloidae नामक परिवार Coleaoptera नामक कुनबे मै का होता है। इसके शरीर में कैन्थारिडिन नामक जहरीला रसायन होता है जो इन फफोलों के लिए जिम्मेवार होता है। इस बीटल के प्रौढ़ कपास की फसल में फूलों की पंखुडियों ,व्  पुंकेसर  को खा कर गुजारा करते हैं। कपास के अलावा यह बीटल सोयाबीन, टमाटर, आलू, बैंगन व घिया-तोरी आदि पर भी हमला करती है जबकि इस बीटल के गर्ब मांसाहारी होते हैं। जमीन के अंदर रहते हुए इनको खाने के लिए टिड्डों, भुन्डों, मैदानी-बीटलों व् बगों के अंडे एवं बच्चे मिल जाते हैं।
जीवन चक्र:
इस बीटल का जीवन चक्र थोड़ा सा असामान्य होता है। अपने यहाँ तेलन के प्रौढ़ जून के महीने में जमीन से निकलना शुरू करते है तथा जुलाई के महीने में थोक के भावः निकलते हैं। मादा तेलन सहवास के 15-20 दिन बाद अंडे देने शुरू कराती है। मादा अपने अंडे जमीन के अंदर 5-6 जगहों पर गुच्छों में रखती है। हर गुच्छे में 50 से 300 अंडे देती है। अण्डों की संख्या मादा के भोजन, होने वाले बच्चों के लिए भोजन की उपलब्धता व मौसम की अनुकूलता पर निर्भर करती है। भूमि के अंदर ही इन अण्डों से 15-20 दिन में तेलन के बच्चे निकलते है जिन्हें गर्ब कहा जाता है। पैदा होते ही ये गर्ब अपने पसंदीदा भोजन "टिड्डों के अंडे" ढुंढने के लिए इधर-उधर निकलते हैं। इस तरह से भूमि में पाए जाने वाले विभिन्न कीटों के अंडे व बच्चों को खाकर, ये तेलन के गर्ब पलते व बढते रहते है। अपने जीवन में चार कांजली उतारने के बाद, ये लार्वा भूमि के अंदर ही रहने के लिए प्रकोष्ठ बनते हैं। पाँचवीं कांजली उतारने के बाद, लार्वा इसी प्रकोष्ठ में रहता है। इस तरह से यह कीट सर्दियाँ जमीन के अंदर अपने पाँच कांजली उतार चुके लार्वा के रूप में बिताता है। यह लार्वा जमीन के अंदर तीन-चार सेंटीमीटर की गहराई पर रहता है। बसंत ऋतु में इस प्रकोष्ठ में ही इस कीट की प्युपेसन होती है। और जून में इस के प्रौढ़ निकलने शुरू हो जाते हैं।

Friday, July 17, 2009

प्राकृतिक कीटनाशी - दस्यु बुगडा

"नन्ही - नन्ही बूंद पडै ........ साँग बिगडग्या सारा", पंडित लखमी चंद की इन मियां - मियां बूंदों जितना बड़ा व बुनावट में गिरती हुई आंसू जैसा यह कीट जिला जींद में किसानों एवं उनकी कपास का सांग ज़माने की पुरजोर कोशिश करता पाया गया है. निडाना,  ईगराह व ललितखेडा के किसान इसे दस्यु बुगडा कहते हैं जबकि कीट वैज्ञानिक इसे ओरियस प्रजाति का एन्थाकोरिड बग कहते हैं. इसके  शिशुओं का रंग सन्तरी व शरीर की लम्बाई बामुश्किल चार मिलीमीटर होती हैं.                                                  इसके प्रौढ़ लगभग चार - पाँच मिलीमीटर लंबे होते हैं. इनकी  पंखों    पर सफ़ेद व काले चित्तके होते हैं. इनकी  प्रौढ मादा अपने जीवन काल में सवा सौ से ज्यादा अंडे देती है. अंडे  पौधों के तंतुओं में दिए जाते हैं. अंड विस्फोटन में चार - पॉँच दिन का समय लग जाता है. अण्डों से निकले, इनके शिशु सात - आठ दिन में पंखदार प्रौढ़ के रूप में विकसित हो जाते हैं. इनका प्रौढिय जीवन तक़रीबन चौबीस- पच्चीस दिन का होता है  . यह बुगडा चूसक किस्म का सामान्य परभक्षी है जिसके भोजन में विभिन्न कीटों के अंडे, अल - चेपे, चुरडे, मक्खी, मच्छर, मिलीबग के शिशु व माँइट्स शामिल होते हैं. एक  दस्यु बुगडा प्रतिदिन तीस से ज्यादा चेप्पे चट कर जाता है.  पुरे जीवन में कितने खायेगा आप ख़ुद गुणा - भाग करके हिसाब लगालें. शिकार न मिले तो पराग --कणों व पौधों के जूस से ही गुजारा कर लेता है . इनके  इस थोड़े से दोगलेपन के कारण ही कीटनाशकों की मार इन पर कुछ ज्यादा ही पडती है.

Monday, May 11, 2009

सुन्दरो: एक प्राकृतिक कीटनाशी

उड़ते हुए देखने पर कभी तितली जैसा तो कभी भिरड़ जैसा नजर आता है यह कीट। बैठने पर लोपा मक्खी जैसा दिखाई देने लगता
है। पेट पर निंगाह पड़ते ही ततैये जैसा दिखाई नजर आने लगता है। ऐसे में लालित खेड़ा की कविता ने इस कीट को सुन्दरो कह दिया तो क्या जुर्म कर दिया। अब यहाँ के किसान इस कीड़े को सुन्दरो के नाम से ही जानते हैं। लेकिन अंग्रेज लोग तो इसे owlfly के नाम से जानते हैं। जबकि इसका ना तो उल्लू से कोई वास्ता ओर ना ही मक्खियों से कोई रिश्ता।  जारजटिया वंश से तालुक रखने वाले Ascalaphidae  परिवार का यह कीटभक्षी खेतों में फसलों के ऊपर उड़ता दिखाई देता है। दे भी क्यों नही! चम्बो को उड़ते हुए ही शिकार जो करना पड़ता है। शिकार अपने हाण के या अपने से छोटे कीट का ही आसानी से किया जा सकता हैं। इनके भोजन में भान्त-भान्त की पौधाहारी सुंडियों के प्रौढ़ पतंगे एवं तितलियाँ, भान्त-भान्त के भूंड एवं भँवरे, भुनगे -फुदके आदि कीट शामिल होते हैं। जो फंस गया उसी से पेट भर लिया। मतलब भोजन के मामले में सुन्दरो नकचढ़ी बिलकुल नही होती। चलताऊ नजर से देखने पर तो चम्बो के ये प्रौढ़ आराम करते हुए बने-बनाये लोपा मक्खी जैसे ही दिखाई देते हैं। पर जरा गौर से निंगाहते ही इसके ढूंढ़रूदार लम्बे-लम्बे एंटीने नजर आने लगते हैं। जो लोपा मक्खियों से मेल नहीं खाते। पर आराम करते हुए इनका बैठने का ढंग लोपा मक्खियों से मेल खाता है।  शिकारियों से बचने के लिए ही बैठने के मामले में चंबो खाड़कू लोपा मक्खियों की नकल करती हैं।

                        यह कीट अपने अंडे पौधों की डालियों पर या फिर जमीन पर ड्लियों के निचे रखते हैं। मौसम की अनुकूलता अनुसार अंडों से 5-6 दिन में लारवे निकलते हैं जो अन्य छोटे-छोटे कीटों को खा पीकर ही पलते-बढते हैं। इस कीट के ये लारवे घात लगाकर शिकार करते हैं। अपना पेट भरने के लिए इस कीट के लारवे व् प्रौढ़ों का दूसरे कीटों पर निर्भर रहना ही इन्हें प्राकृतिक कीटनाशी के रूप में अपना वजूद कायम करने के लिए काफी है। मगर इस आपाधापी व् बिसराण के बाजारू युग में किसे फुरसत है विषमुक्त खेती के लिए इनके इस लाजवाब कार्य को परखने व् मान्यता देने की।

Tuesday, February 24, 2009

मिलीबग के कुशल शिकारी - लेडिबीटल



मिलीबग के कुशल शिकारी के रूप में जिला जींद की धरती पर दस किस्म की बुगडी पायी गई है । स्थानीय लोग इन्हें मनयारी या जोगिन कहते हैं. स्कूल में पढने वाले इन्हें पास-फेल के रूप में जानते हैं. अंग्रेज लोग इन्हें लेडिबीटल या लेडीबग के नाम से पुकारते हैं। इनके बालिग व शिशु जन्मजात मांसाहारी कीट होते हैं । इनके भोजन में विभिन्न कीटों के अंडे, तरुण सुंडियां, अल या चेपा, मिलीबग, चुरडा, तेला, सफ़ेद मक्खी व् फुदका आदि अनेक हानिकारक कीट शामिल होते हैं। जिन्हें ये बड़े चाव से खाते हैं। हमारे खेतों में इनकी उपस्तिथि ,कीटनाशकों पर होने वाले खर्च में कटोती करवा सकती है। हम इन्हें उम्दा कीटनाशी भी कह सकते हैं क्योंकि ये कीटों को खा कार उनका सफाया हमारे लिए मुफ्त में ही करते हैं जबकि कीटनाशकों पर इसी काम के लिए हमें पैसा खर्च करना पडता है। अतः हम इनकी सही पहचान, हिफाजत व वंशवृद्धि कर जहाँ खेती के खर्च को घटा सकते हैं वहीं कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से मानव स्वस्थ की रक्षा कर बहुत बड़ी समाज सेवा भी कर सकते हैं।