| प्रौढ़ मुद्रो |
Showing posts with label friends. Show all posts
Showing posts with label friends. Show all posts
Thursday, August 23, 2012
मुद्रो - एक कीटनाशी कीट
Labels:
agriculture,
biocontrol,
BT botton,
crop protection,
defenders,
farmer-friend,
foes,
friends,
GM crops,
haryana agriculture,
ipm,
jind,
kharakramji,
nandgarh,
nidana,
pest control,
predators
Saturday, July 30, 2011
प्राकृतिक कीटनाशी - बिन्दुआ बुग्ड़ा
बिन्दुआ बुग्ड़ा एक मांसाहारी कीट है जो अपना गुजर-बसर दुसरे कीटों का खून चूस कर करता है। कांग्रेस घास पर यह कीट दुसरे कीटों की तलाश में ही आया है। कांग्रेस घास के पौधों पर इसे मिलीबग, मिल्क-वीड बग़ व जाय्गोग्राम्मा बीटल आदि शाकाहारी कीट व इनके शिशु व अंडे मिल सकते है। इस घास पर इन्हें खून पीने के लिए इन शाकाहारी कीटों के अलावा कीटाहारी कीट भी मिल सकते है। इन सभी मध्यम आकार के कीटों का खून चूस कर ही बिन्दुआ बुग्ड़ा व इसके बच्चों का कांग्रेस घास पर गुज़ारा हो पाता है।
स्टिंक बग़ की श्रेणी में शामिल इस बिन्दुआ बुगडा को अंग्रेज "two spotted bug" कहते हैं। कीट वैज्ञानिक इसे द्विपदी प्रणाली के मुताबिक "Perillus bioculatus" कहते हैं। इस बुग्ड़े के परिवार का नाम "Pentatomidae" है तथा वंश-क्रम "Hemiptera" है.
इन बिन्दुआ बुग्ड़ों का शरीर चौड़ा व शिल्ड्नुमा होता है। इनकी पीठ पर ध्यान से देखे तो अंग्रेजी का वाई अक्षर भी नज़र आ जाता है. इनके प्रौढ़ों के शरीर की लम्बाई 10 से 12 मिमी तक होती है। इनके निम्फ 8 से 9 मिमी लंबे होते है. निम्फों के शरीर का रंग पीला-पीला या लालिया संतरी होता है. इस बुग्ड़े की प्रौढ़ मादा मधुर मिलन के बाद प्राय: दो दर्जन अंडें पत्तियों के उपरली सतह या टहनियों पर देते हैं. इन अण्डों को वे दो पंक्तियों में एक-दुसरे से सटा कर रखते हैं. इन अण्डों से छ:-सात दिन में निम्फ निकलते है. अंडे से प्रौढ़ विकसित होने में तक़रीबन 25 -30 दिन का समय लगता है.
इंसानों द्वारा छेड़े जाने पर ये बिन्दुआ बुग्ड़े बेचैन करने वाली तीक्ष्ण गंध छोड़ते हैं। इस गंध रूपी हथियार को ये कीट दुसरे कीटों से अपना बचाव करने में भी इस्तेमाल करते हैं। आलू की फसल को नुकशान पहुचने वाली कोलोराडो बीटल के तो ग्राहक होते है ये बिन्दुआ बुग्ड़े। इस बुग्ड़े के नवजात पहली कांजली उतारने तक तो पौधों का जूस पीकर गुजारा करते हैं. इसके बाद तो ताउम्र मांसाहारी रहते हैं. कीट वैज्ञानिक बताते हैं कि ये निम्फ प्रौढ़ विकसित होने तक तक़रीबन इस बीटल के 300 अंडे, 4 लार्वे व् 5 प्रौढ़ डकार जाते हैं. प्रौढ़ जीवन जीने के लिए प्रतिदिन दो के लगभग बीटल के लार्वा तो मिलने ही चाहियें. इसी जानकारी का फायदा उठाकर कीटनाशी उद्योग द्वारा इन बुग्ड़ों को भी जैविक-नियंत्रण के नाम पर बेचा जाने लगा है। साधारण से साधारण जानकारी को भी मुनाफे में तब्दील करना कोई इनसे सीखे। साधारण ज्ञान को विज्ञानं बनाकर तथा फिर इसे तकनिकी बताकर ये कीटनाशी उद्योग किसानों को तो बेवकूफ बना सकते है पर प्रकृति को नही. जिला जींद के निडानी गावं की खेत पाठशाला के किसानों संदीप व् राजेश तथा खेती विरासत मिशन, जैतों(पंजाब) के गुरप्रीत, अमनजोत, बलविन्द्र व् अमरप्रीत ने कीट-कमांडो रणबीर मलिक व् कप्तान के नेतृत्त्व में कांग्रेस घास पर मेक्सिकन बीटल के गर्ब का खून चूसते हुए इस बुग्ड़े के निम्फ को मौके पर देखा व् फोटो खीचा. इन्होने इस बुग्ड़े के प्रौढ़ एवं निम्फ की मेक्सिकन बीटल के बच्चे का परभक्षण करते हुए विडिओ तैयार की. इसी गावं के खेतो में रजबाहे के किनारे खड़े कांग्रेस घास के पत्तों पर कीट-कमांडो रणबीर मलिक ने इस बिन्दुवा बुग्ड़े के अण्डों से एक परजीव्याभ निकलते देख लिया. यहाँ के किसानों ने मिलीबग के परजीव्याभों अंगीरा, जंगिरा व् फंगिरा की तर्ज़ पर बंगिरा नाम दिया है.
स्टिंक बग़ की श्रेणी में शामिल इस बिन्दुआ बुगडा को अंग्रेज "two spotted bug" कहते हैं। कीट वैज्ञानिक इसे द्विपदी प्रणाली के मुताबिक "Perillus bioculatus" कहते हैं। इस बुग्ड़े के परिवार का नाम "Pentatomidae" है तथा वंश-क्रम "Hemiptera" है.
| बिन्दुवा बुग्ड़े का निम्फ |
| अंडे |
| बिन्दुवा बुग्ड़े के अंडे से निकला- बंगिरा |
किसी ने सच ही कहा है, "जी का जी बैरी". कांग्रेस घास को उपभोग करती है मेक्सिकन बीटल और उसके बच्चे. बिन्दुआ बुग्ड़े मेक्सिकन बीटल और उसके बच्चे को खा-पीकर गुजारा करते है. बंगिरा अपने बच्चे इन बिन्दुआ बुग्ड़ों के अण्डों में पालता है.
काश! हरियाणा के सभी किसान इस प्राकृतिक कीटनाशी को पहचानते होते तो वे भी रणबीर, मनबीर व् इनके साथियों की तरह कीटनाशी मुक्त खेती कर रहे होते.
Friday, August 6, 2010
छैल-मक्खी - एक परभक्षिया कीटनाशी
![]() |
| छैल मक्खी अन्य छैल को खाते हिए। |
![]() |
| आराम फरमाती छैल मक्खी |
| आराम फरमाती छैल मक्खी। |
![]() |
| रति रत जोड़े। |
![]() |
| आराम |
Labels:
'farmers field school',
"BT botton",
"crop protection",
"GM crops",
"pest control",
agriculture,
biocontrol,
farmers,
foes,
friends,
haryana,
insects,
ipm,
jind,
nandgarh,
nidana,
roots
Wednesday, July 29, 2009
प्राकृतिक कीटनाशी - डायन मक्खी
![]() |
| टिड्डे का शिकार करती डायन मक्खी। |
डायन मक्खी घोर अवसरवादी एवं प्रभावशाली परभक्षी होती है. डायन मक्खी के ये गुण इसके शारीरक ढांचे में निहित होते हैं. इन मक्खियों की टांगें काफी मजबूत होती हैं. ऊपर से इन पर कसुते कांटे होते हैं. इनके माथे पर दो जटिल एवं विशाल आँखों के मध्य खास खड्डे में तीन सरल आँखें भी होती हैं. अपनी इन आँखों व् टांगों के कारण ही ये मक्खियाँ शिकार का कोई अवसर हाथ से नही जाने देती. इनके चेहरे पर कसुते करड़े बालों वाली मुच्छ होती हैं जो मुठभेड़ के समय इनके बचाव के काम आती हैं.
![]() |
| टिड्डे को बेहोश करती डायन मक्खी। |
शिकार फांसने के लिए लुटेरों जैसी रणनीति के कारण ही शायद इन्हें डायन या डाकू मक्खी कहा जाने लगा. डायन मक्खी अपने अड्डे से शिकार करती हैं. ये मक्खी अपना अड्डा खुली एवं धुप वाली जगह बनाती हैं. अड्डे की जगह पौधों की टहनी, ठूंठ, पत्थर व ढेला आदि कुछ भी हो सकती है. इस मचान पर बैठ कर ही यह मक्खी अपने शिकार का इंतजार करती रहती है. यहाँ से गुजरने वाले शिकार पर झपटा मरने के लिए इस मचान से उड़ान भरती हैं. कीट वैज्ञानिकों का कहना हैं कि यह डायन मक्खी अपनी टोकरिनुमा कांटेदार टांगों से ही उड़ते हुए कीटों को काबू करती हैं. हमने तो इस मक्खी को कई बार जमीन पर बैठे - बिठाए टिड्डों को भी झपटा मार कर अपनी गिरफ्त में लेते हुए देखा है.
![]() |
| टिड्डे का खून पिते हुए डायन मक्खी। |
इनके भोजन में मक्खी, टिड्डे, भुंड, भिरड, बीटल, बग़, पतंगे व तितली आदि कीट शामिल होते हैं. डायन मक्खी कई बार अपने से बड़े जन्नोर का शिकार भी कुशलता से कर लेती हैं.
Labels:
biocontrol,
btcotton,
crop protection,
defenders,
friends,
GM crops,
ipm,
jind,
Machimus spp,
nidana
Tuesday, July 28, 2009
कपास में पुष्प-चर्वक कीट - तेलन
![]() |
| पुष्प पंखुड़ी भक्षण करती - तेलन |
![]() |
| पुष्प पुंकेसर भक्षण करती - तेलन |
![]() |
| उल्टी काण्ड पर तेलन |
जीवन चक्र:
इस बीटल का जीवन चक्र थोड़ा सा असामान्य होता है। अपने यहाँ तेलन के प्रौढ़ जून के महीने में जमीन से निकलना शुरू करते है तथा जुलाई के महीने में थोक के भावः निकलते हैं। मादा तेलन सहवास के 15-20 दिन बाद अंडे देने शुरू कराती है। मादा अपने अंडे जमीन के अंदर 5-6 जगहों पर गुच्छों में रखती है। हर गुच्छे में 50 से 300 अंडे देती है। अण्डों की संख्या मादा के भोजन, होने वाले बच्चों के लिए भोजन की उपलब्धता व मौसम की अनुकूलता पर निर्भर करती है। भूमि के अंदर ही इन अण्डों से 15-20 दिन में तेलन के बच्चे निकलते है जिन्हें गर्ब कहा जाता है। पैदा होते ही ये गर्ब अपने पसंदीदा भोजन "टिड्डों के अंडे" ढुंढने के लिए इधर-उधर निकलते हैं। इस तरह से भूमि में पाए जाने वाले विभिन्न कीटों के अंडे व बच्चों को खाकर, ये तेलन के गर्ब पलते व बढते रहते है। अपने जीवन में चार कांजली उतारने के बाद, ये लार्वा भूमि के अंदर ही रहने के लिए प्रकोष्ठ बनते हैं। पाँचवीं कांजली उतारने के बाद, लार्वा इसी प्रकोष्ठ में रहता है। इस तरह से यह कीट सर्दियाँ जमीन के अंदर अपने पाँच कांजली उतार चुके लार्वा के रूप में बिताता है। यह लार्वा जमीन के अंदर तीन-चार सेंटीमीटर की गहराई पर रहता है। बसंत ऋतु में इस प्रकोष्ठ में ही इस कीट की प्युपेसन होती है। और जून में इस के प्रौढ़ निकलने शुरू हो जाते हैं।
Labels:
biocontrol,
blister beetle,
btcotton,
cotton-pests,
crop-protection,
farmers,
farmers field school,
ffs,
foes,
friends,
insects,
Mylabris,
nidana,
npm,
pest control,
predators
Friday, July 17, 2009
प्राकृतिक कीटनाशी - दस्यु बुगडा
Labels:
agriculture,
anthocorid-bug,
crop-protection,
defenders,
farmer-friend,
friends,
nandgarh,
nidana,
npm,
orius-sp,
predators
Monday, May 11, 2009
सुन्दरो: एक प्राकृतिक कीटनाशी
है। पेट पर निंगाह पड़ते ही ततैये जैसा दिखाई नजर आने लगता है। ऐसे में लालित खेड़ा की कविता ने इस कीट को सुन्दरो कह दिया तो क्या जुर्म कर दिया। अब यहाँ के किसान इस कीड़े को सुन्दरो के नाम से ही जानते हैं। लेकिन अंग्रेज लोग तो इसे owlfly के नाम से जानते हैं। जबकि इसका ना तो उल्लू से कोई वास्ता ओर ना ही मक्खियों से कोई रिश्ता। जारजटिया वंश से तालुक रखने वाले Ascalaphidae परिवार का यह कीटभक्षी खेतों में फसलों के ऊपर उड़ता दिखाई देता है। दे भी क्यों नही! चम्बो को उड़ते हुए ही शिकार जो करना पड़ता है। शिकार अपने हाण के या अपने से छोटे कीट का ही आसानी से किया जा सकता हैं। इनके भोजन में भान्त-भान्त की पौधाहारी सुंडियों के प्रौढ़ पतंगे एवं तितलियाँ, भान्त-भान्त के भूंड एवं भँवरे, भुनगे -फुदके आदि कीट शामिल होते हैं। जो फंस गया उसी से पेट भर लिया। मतलब भोजन के मामले में सुन्दरो नकचढ़ी बिलकुल नही होती। चलताऊ नजर से देखने पर तो चम्बो के ये प्रौढ़ आराम करते हुए बने-बनाये लोपा मक्खी जैसे ही दिखाई देते हैं। पर जरा गौर से निंगाहते ही इसके ढूंढ़रूदार लम्बे-लम्बे एंटीने नजर आने लगते हैं। जो लोपा मक्खियों से मेल नहीं खाते। पर आराम करते हुए इनका बैठने का ढंग लोपा मक्खियों से मेल खाता है। शिकारियों से बचने के लिए ही बैठने के मामले में चंबो खाड़कू लोपा मक्खियों की नकल करती हैं।
Tuesday, February 24, 2009
मिलीबग के कुशल शिकारी - लेडिबीटल

मिलीबग के कुशल शिकारी के रूप में जिला जींद की धरती पर दस किस्म की बुगडी पायी गई है । स्थानीय लोग इन्हें मनयारी या जोगिन कहते हैं. स्कूल में पढने वाले इन्हें पास-फेल के रूप में जानते हैं. अंग्रेज लोग इन्हें लेडिबीटल या लेडीबग के नाम से पुकारते हैं। इनके बालिग व शिशु जन्मजात मांसाहारी कीट होते हैं । इनके भोजन में विभिन्न कीटों के अंडे, तरुण सुंडियां, अल या चेपा, मिलीबग, चुरडा, तेला, सफ़ेद मक्खी व् फुदका आदि अनेक हानिकारक कीट शामिल होते हैं। जिन्हें ये बड़े चाव से खाते हैं। हमारे खेतों में इनकी उपस्तिथि ,कीटनाशकों पर होने वाले खर्च में कटोती करवा सकती है। हम इन्हें उम्दा कीटनाशी भी कह सकते हैं क्योंकि ये कीटों को खा कार उनका सफाया हमारे लिए मुफ्त में ही करते हैं जबकि कीटनाशकों पर इसी काम के लिए हमें पैसा खर्च करना पडता है। अतः हम इनकी सही पहचान, हिफाजत व वंशवृद्धि कर जहाँ खेती के खर्च को घटा सकते हैं वहीं कीटनाशकों के दुष्प्रभावों से मानव स्वस्थ की रक्षा कर बहुत बड़ी समाज सेवा भी कर सकते हैं।
Labels:
agriculture,
biocontrol,
farmers,
foes,
friends,
ladybeetle,
ladybug,
mealybug,
nidana,
predators
Subscribe to:
Posts (Atom)









