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Thursday, August 23, 2012

मुद्रो - एक कीटनाशी कीट

प्रौढ़ मुद्रो 

 जारजटिया वंश से तालुक रखने वाला यह कीटभक्षी निडाना के खेतों में सुबह या शाम को फसलों के ऊपर उड़ता दिखाई देता है। दे भी क्यों नही! मुद्रो को उड़ते हुए ही शिकार जो करना पड़ता है। शिकार अपने हाण के या अपने से छोटे कीट का ही आसानी से किया जा सकता हैं। इनके भोजन में भान्त-भान्त की पौधाहारी सुंडियों के प्रौढ़ पतंगे एवं तितलियाँ, भान्त-भान्त के भूंड एवं भँवरे, भुनगे -फुदके आदि कीट शामिल होते हैं। जो फंस गया उसी से पेट भर लिया। मतलब भोजन के मामले में मुद्रो नकचड़ी बिलकुल नही होती। चलताऊ नजर से देखने पर तो मुद्रो के ये प्रौढ़ बने-बनाये लोपा मक्खी जैसे ही दिखाई देते हैं। पर जरा गौर से निंगाहते ही इसके ढूंढ़रूदार लम्बे-लम्बे एंटीने नजर आने लगते हैं। जो लोपा मक्खियों से मेल नहीं खाते। आराम करते हुए इनका बैठने का ढंग भी लोपा मक्खियों से मेल नही खाता। एंटीने व् पंख टहनी के सामांतर तथा शरीर लम्वत- शिकारियों से बचने के लिए लाजवाब छलावरण
                        यह कीट अपने अंडे पौधों की डालियों पर या फिर जमीन पर ड्लियों के निचे रखते हैं। मौसम की अनुकूलता अनुसार अंडों से 5-6 दिन में लारवे निकलते हैं जो अन्य छोटे-छोटे कीटों को खा पीकर ही पलते-बढते हैं। इस कीट के ये लारवे घात लगाकर शिकार करते हैं। अपना पेट भरने के लिए इस कीट के लारवे व् प्रौढ़ों का दूसरे कीटों पर निर्भर रहना ही इन्हें प्राकृतिक कीटनाशी के रूप में अपना वजूद कायम करने के लिए काफी है। मगर इस आपाधापी व् बिसराण के बाजारू युग में किसे फुरसत है विषमुक्त खेती के लिए इनके इस लाजवाब कार्य को परखने व् मान्यता देने की।

Wednesday, July 25, 2012

ईंख में काला बुग्ड़ा

Cavelerius excavatus Dist.
हरियाणा में इस कीट को काली भुंडी या काली कीड़ी कहा जाता है। क्यों? यह हम्में भी मालूम नहीं। पर यह पक्का पता है कि अंग्रेज इसे black bug कहते है।  कीट विज्ञानी इस कीड़े को अपनी भाषा में Cavelerius excavatus Dist. पुकारते हैं। वे इसका वंशक्रम Hemiptera व् कुटुंब  Lygaeidae बताते हैं। लम्बौतरे बदन वाले इस काले कीट के प्रौढ़ की टांगों का रंग बादामी व् पंखों का रंग कहीं से सफ़ेद तथा कहीं से काला होता है। पंखों पर बादामी रंग के W व् Y चिन्ह होते हैं। इसके शिशु शारीरिक बुनावट में तो अपने प्रौढ़ों के समान होते हैं पर आकार छोटा होता है। ये शिशु काले व् गुलाबी रंगों की छटा लिए पंखविहीन होते हैं।  इस कीट के प्रौढ़ व निम्फ दोनों ही ईंख की फसल में पर्णचक्करी में छुपकर रहते हैं व् पत्तों से रस चूस कर अपना पेट पालते हैं। ईंख के पत्तों से इन द्वारा रस चूसने के कारण, निसंदेह पौधों में रस की मात्रा कम हो जाती है पर सामान्य परस्थितियों में पौधे अपनी क्षतिपूर्ति क्षमताओं के चलते इस कमी को पूरा कर लेते हैं। पर इस कीड़े को गर्म व् शुष्क मौसम ज्यादा माफ़िक बैठता है। इसीलिए हरियाणा में यह कीट मई -जून के महीनों में ज्यादा दिखाई देता है। पहले मोढ़ी में दिखाई देता है व् बाद में बौअड़ में। सूखे व् रूखे हालात में ही इस कीड़े का रस पीकर गुज़ारा करना ईंख की फसल व् फसल के मालिक को महंगा पड़ सकता है। फसल अपनी इस पीड़ा को अपने पत्तों का रंग हल्दिया कर अपने मालिक को मदद के लिए गुहार लगाती है। सिंचाई के साथ-साथ अगर जिंक-यूरिया-डी.ए.पी. के 5.5% घोल का स्प्रे हो जाये तो पौधे इस रस हानि क़ी क्षतिपूर्ति कर लेते हैं।    ईंख के अलावा यह मक्की, धान व् कई तरह के घासों पर भी गुज़ारा कर लेता है।

Monday, February 13, 2012

सरसों में चेपा- एक शाकाहारी कीट

चेपा सरसों की फसल का प्रमुख कीट है। इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही सरसों की फसल में पत्तों, टहनियों, फुन्गलों, कलियों व् कच्ची फलियों से रस पीकर अपना जीवनयापन एवं वंशवृद्धि करते हैं। अंग्रेज इसे Aphid कहते हैं। जबकि कीट विज्ञानी इस कीट को Lipaphis erysimi नाम से पुकारते हैं। इस चेपे का वंशक्रम Hemiptera व् कुटुंब Aphididae होता है।
सरसों की फसल के अलावा यह कीट तोरिया, तारामीरा, बंदगोभी, फूलगोभी व् करम कल्ला आदि फसलों में भी पाया जाता है। दिसम्बर से मार्च के मध्य सर्द एवं मेघमय मौसम इस कीट के लिए सर्वाधिक माफिक होता है। इस कीट की मादा अपने जीवनकाल में बिना निषेचन ही तकरीबन सौ-सवासौ शिशुओं को जन्म देती है। इस तरह पैदा हुए सभी बच्चे जनाने होते हैं और सात-आठ दिन में ही खा पीकर प्रौढ़ मादा के रूप में विकसित हो जाते हैं। इस तरह से एक साल में ही इस कीट की एक-दुसरे में गुत्थी हुई चालीस-चवालीस पीढियां पैदा हो जाती हैं। वसंत व् पतझड़ ऋतू में इस कीट की मादाएं नारों से मधुर-मिलन करके निषेचित प्रजनन से बच्चे पैदा करती हैं। ये शिशु पंखदार प्रौढ़ों के रूप में विकसित होते हैं। यही पंखदार प्रौढ़ गर्मियों में पहाड़ों पर कूच कर जाते हैं। लेकिन इस व्यापक प्रव्रजन के बावजूद मामूली संख्या में ये यहाँ भी रह जाते हैं जो गोभिया व् सरसों कुल के आवारा पौधों पर गुज़ारा करते हुए नजर आ जाते हैं। 
  इस कीट का ज्यादा प्रकोप होने पर सरसों के पौधे निश्तेज़ होने लगते हैं। प्रकोपित पत्ते मुड़ने-तुड़ने लगते हैं। प्रकोपित फूलों से फलियाँ नही बन पाती। प्रकोपित फलियों में दानें हलके रह जाते हैं। पर मजबूत खाद्य श्रृंखला वाले इस प्राकृतिक तंत्र में एक-तरफा फूलने-फलने की छुट किसी भी जीव को नही है। फिर ये चेपा कैसे अपवाद हो सकता है! इस चेपे के निम्फों एवं प्रौढ़ों को खा कर अपना व् बच्चों का  पेट भरने वाले अनेकों कीट भी सरसों की फसल में पाए जाते हैं। लपरो(Coccinella septumpunctata) व् चपरो(Menochilus sexmaculatus) नामक लेडी बिटलों के प्रौढ़ एवं बच्चे इस चेपे को थोक के भाव खाते हैं। सिरफड़ो(Syrphus spp) मक्खी की अनेकों प्रजातियों के मैगट भी इस कीट के शिशुओं व् प्रौढ़ों का भक्षण उछाल-उछाल कर बड़े चाव से करते हैं।
    दीदड़ बुग्ड़े के प्रौढ़ एवं शिशु भी इस चेपे का खून पीकर गुज़ारा करते देखे गये हैं।
Lysiphlebus testaceipes
             एफ़ीडियस नामक परजीव्याभ सम्भीरका के साथ-साथ अन्य कई परजीव्याभ सम्भीरकायें भी अपने बच्चे इस चेपे के पेट में पलवाती हैं। चेपे के पेट में एफ़ीडियस का बच्चा पड़ते ही चेपा फुल कर कुपा होने लगता है और खाना पीना छोड़ देता है। अंतत: चेपा बिराने बालक पालने के चक्कर में ही मारा जाता है।  
कीटभक्षी कवक
            कुछ कीटभक्षी कवक भी इस चेपे को मौत की नींद सुलाते पाए जाते हैं। ऐसी एक सफ़ेद रंग की फफूंद से ग्रसित चेपा प.जयकिशन के खेत में किसानों ने सरसों की फसल में पकड़ा है। इस फफूंद के कारण चेपा रोग ग्रस्त होकर मौत की नींद सौ चूका है।
इतने सारे कीटभक्षी कीट एवं कवक तथा परजीव्याभ कीट मिलकर इस चेपे को निरंतर खत्म करते रहते हैं। इस तरह से यह चेपा शायद ही हमारी फसल में हानि पहुचने के स्तर पर पहुंचे। इसीलिए किसानों को कीड़े काबू करने की बजाय उनको जानने व् समझने की कौशिश करनी चाहिए।

Tuesday, February 7, 2012

साँठी वाली सुंडी

 साँठी वाली सुंडी एक ऐसा कीड़ा है जो कपास की फसल में पाए जाने वाले  साँठी, चौलाई व् कुंदरा आदि खरपतवारों के पत्तों को खा कर अपना गुज़ारा करता है। जिला जींद के निडाना गावं में किसानों ने अनेक अवसरों पर इस कीड़े को अपनी कपास की फसल में साँठी को ख़त्म करते हुए देखा है। खरपतवार का प्राकृतिक नियंत्रण। पर अफ़सोस कि बहुत सारे किसानों को भय बना रहता है कि कहीं यह कीड़ा सांठी को ख़त्म करके उनकी कपास की फसल को नुकशान न करदे। इसीलिए वो साँठी को ख़त्म करने के लिए खरपतवारनाशियों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन निडाना खेत पाठशाला के किसान इस साँठी का सफाया करने के लिए किसी खरपतवारनाशी का इस्तेमाल नही करते। उनके खेतों में तो यह साँठी वाली सुंडी ही यह काम कर देती है। उन्होंने कभी भी इस साँठी वाली सुंडी को कपास के पत्ते खाते नहीं देखा। फिर इससे डर कहे का?
 इस कीड़े को कीट विज्ञानं की भाषा में Spoladea recurvalis कहते हैं। इस कीड़े के कुनबे का नाम Crambidae है। इसका वंशक्रम Lepidoptera है। अंग्रेज इस कीड़े को beet webworm कहते हैं। यह कीड़ा भगवान की तरह सर्वशक्तिमान हो या ना हो पर सर्वव्यापी तो है। दुनिया के तकरीबन देशों में पाया जाता है।
इस कीट के प्रौढ़ का रंग गहरा भूरा होता है तथा इसके पंखों पर सफेद धारियाँ होती है। इसकी शिवासन मादा एक-एक करके या गुच्छों में अंडे देती है। अंडे साँठी के पत्तों की निचली सतह पर दिए जाते हैं। इस कीट की मादा पतंगा अपने 12 -14  दिन के जीवन काल में लगभग 200  अंडे देती है। इन अण्डों से 5 -6  दिन में नवजात सुंडियां निकलती हैं। इन नवजात एवं तरुण सुंडियों की त्वचा पारदर्शी व् रंग हरा होता है। बड़ी होने पर इन सुंडियों का रंग लाल सा हो जाता है। इन सुंडियों को पूर्ण विकसित होने में 20 -22  दिन का समय लगता है। इस दौरान ये 4 -5 बार कांजली उतारती है। ये सुंडियां भूखड़ किस्म की होती हैं।  मुख्य शिरा को छोड़कर पुरे के पुरे पत्ते को खा जाती है। ढांचा भर रहे साँठी के पौधे अंतत: सुखकर मर जाते है।
                                         हमारी फसलों में इस सुंडी का उपभोग करने के लिए Cotesia plutellae नामक ब्रेकोन सम्भीरका बहुतायत में होती हैं। ट्राईकोग्रामा नामक सम्भीरका अपने बच्चे इस कीड़े के अण्डों में पालती है। इस कीट के प्रौढ़ों को उड़ते हुए ही लोपा मक्खियाँ पकड़ लेती हैं व् चट कर जाती हैं। डायन मक्खियाँ इस कीट के प्रौढ़ पतंगों का शिकार दिन-धौली करती हैं। दीदड़ बुग्ड़े, फलैरी बुग्ड़े, कातिल बुग्ड़ेसिंगु बुग्ड़े इस कीट के अंडों से जूस व् सुंडियों से खून पीने की ताक में रहते हैं। निडाना के किसानों ने इस कीट के प्रौढ़ पतंगों को मकड़ियों द्वारा लपेटते व् खाए जाते देखा है। मुंद्रो व् सुंद्रो नामक जारजटिया समूह के कीट भी इस कीट को भोजन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। प्रकृति में इतना गज़ब का संतुलन होने के बावजूद भय एवं भ्रम के शिकार किसान इस कीट को काबू करने के लिये पीठ पर कीटनाशी पिठू लादे मिल जायेंगे। ऐसे समझदार किसानों का तो राम बरगा यू कीटनाशी बाज़ार ही रुखाला हो सकता है!

Sunday, January 22, 2012

कुम्हारी-एक कीटनाशी ततैया

 "पतली कमर पर ढुंगे पै चोटी कोन्या !!
सै कुम्हारी पर कुम्हारों आली कोन्या !!"

असल में यह तो भीरड़-ततैयों वाले कुनबे की सै। अपना जापा काढण ताहि यह ततैया चिकनी मिटटी से छोटे-छोटे मटकों का निर्माण करती है। इसीलिए किसानों ने इसका नाम कुम्हारी रख लिया। वैसे तो इस ततैया की दुनिया भर में सैकड़ों प्रजातीय पाई जाती होंगी पर निडाना की कपास व् धान की फसल में तो अभी तक किसानों ने यही एक प्रजाति देखी है। यह कीट एकांकी जीवन जीने का आदि है मतलब समूह की बजाय अकेले-अकेले रहना पसंद करता है। काली, पीली व् गुलाबी छटाओं वाली इस ततैया की शारीरिक लम्बाई तकरीबन 15 -17  मी.मी. होती है। यह सही है कि इस कीट के प्रौढ़ तो फूलों से मधुरस पीकर अपना गुजर-बसर करते हैं पर इनके शिशुओं को अपनी शारीरिक वृद्धि के लिए बिना बालों वाली सुंडियां चाहिए। इसीलिए तो आशामेद होते ही इस कीट की मादा अंडे देने के लिए चिकनी मिटटी के छोटे-छोटे मटकों का निर्माण शुरू करती है। मटकों के लिए घरों से बाहर ऐसी जगह का चुनाव करती है जहाँ ये मटके सूरज के ताप, वायु के वेग और वर्षा की आल से सुरक्षित रह सके। चिकनी मिटटी तलाश कर, उसकी छोटी-छोटी गोलियां बनाती है तथा उन्हें अपने मुहँ और अगली टांगों की सहायता से निर्माण स्थल तक लाती है। इस मादा को एक फेरा पूरा करने में पांच मिनट तथा एक मटका घड़ने में लगभग आधा दिन लग जाता है। इस कपास के पत्ते पर मिटटी तो तीन मटकों के लिए ढ़ो राखी थी पर निर्माण एक का ही कर पाई थी कि फोटों खीचने वालों ने तंग कर दी। मटके घड़ने का काम पूरा करके खेतों में निकलती है यह मादा ततैया। वहां रोयें रहित सुंडियां तलाशती है। एक सुंडी ढूंढने में घंटा लग जाता है। सुंडी मिलते ही अपने डंक द्वारा जहर छोड़ कर उस सुंडी को लुंज कर देती है और उसे मटके में ला पटकती है। प्रत्येक मटके में सात-आठ से दस- बारह सुंडी रखती है। फिर हरेक मटके में अपना एक अंडा रखती है। इसके शिशु इन भंडारित सुंडियों को ही खा-पीकर विकसित होते है। मटके में ही प्युपेसन अवस्था पूरी करते हैं। मटके में अंड-निक्षेपण के बाद यह मादाएं मटके के मुहँ को बंद करना नही भूलती। आवासीय निर्माण के दौरान और बाद में भी ये ततैया मटकों के पास विश्राम नहीं करती। इस ततैया के नर मधुर-मिलन के अलावा दूर से ही सही, इन मटकों क़ी चौकीदारी तो करते हैं।
हमारी फसलों में सुंडियों के नियंत्रण के लिए बड़े काम क़ी हैं ये कुम्हारी। जिस तरह से कुम्हारों ने इस कीट से मटके बनाना सीखा ठीक उसी तरह से किसानों को इस कीट से कीट नियंत्रण के पहाड़े सिखने आवश्यकता है। और हमेँ किसानों के लिए व्यापक पैमाने पर कीट साक्षरता अभियान चलाने क़ी।

Wednesday, January 18, 2012

लाल मटकू - एक कीटनाशी बुग्ड़ा

कपास की फसल में कच्चे बीजों से तेल पीने वाला एक बदबूदार कीड़ा है लाल बनिया जिसका शिकार करने वाले कीड़े इस प्रकृति में बहुत कम हैं. इन्हीं में से एक कुशल शिकारी है यह लाल- मटकू जी हाँ! सरसरी तौर पर देखने से तो यह बुग्ड़ा भी लाल बनिये जैसा ही नजर आता है. आये भी क्यों नही? दोनों का वंशक्रम Heteroptera व् कुनबा Pyrrhocoridae एक ही जो ठहरा. कीट विज्ञानियों की बोली में इस लाल- मटकू का नाम है: Antilochus cocqueberti. माध्यम आकार के इस बुग्ड़े का रंग कहीं से लाल और कहीं से काला होता है पर ये दोनों रंग होते है खूब चटकीले. इसके शारीर की बनावट लम्बौत्रिय अंडाकार होती है. इनके शारीर की लम्बाई अमूमन 16 -17 सै.मी. होती है. इनके निम्फ भी देखने में इन जैसे ही होते हैं सिवाय पंखों के. इस बुग्ड़े के निम्फ व् प्रौढ़ दोनों ही लाल बनिये का खून पीकर अपना गुजर-बसर व् वंश वृद्धि करते हैं. इसके अलावा हमारी फसलों में कभी कभार दिखाई देने वाले Alydidae कुल के बुग्ड़ों का भी बखूबी शिकार कर लेते हैं.

 इस लाल मटकू  का प्रौढ़ जीवन काल तकरीबन दो से छ: माह का होता है, इस दौरान इसकी प्रौढ़ मादा औसतन 10 -12 बार अंड-निक्षेपण करती है. एक बार में 60 से 70 अंडे देती है. इस तरह से अपने जीवन काल में 600 - 700 अंडे देती है. अंड निक्षेपण से लेकर प्रौढ़ विकसित होने तक इन्हें दिवस अवधि अनुसार 45 से 90 दिन तक का समय लग जाता है. अपना जीवन पूरा करने के लिए इस कीड़े को 250 से भी ज्यादा लाल बनियों का खात्मा करना पड़ता है. यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस लाल मटकू के निम्फ लाल बनिये के निम्फों का तथा प्रौढ़ प्रौढ़ों का शिकार करना पसंद करते हैं.
लाल मटकू के अंडे 
वैकल्पिक मेजबानों की उपलब्धता व् इसकी अति सक्रियता के कारण कपास कि फसल में इस लाल बनिये को कीटनाशकों के इस्तेमाल से काबू करना नामुमकिन कार्य है. ऐसे हालात में प्रकृति प्रदत यह लाल-मटकू कपास की फसल में लाल बनिये को काबू रखने के लिए किसानों की सहायता कर सकता है. बशर्ते कि हम इसे अच्छी तरह से पहचानने लग जाये. 

Tuesday, January 17, 2012

तरखान ततैया - कीटनाशी ततैया!



तरखान ततैया ! जी हाँ, सुरंग बना कर बाथू और खड़बाथू के तने में अपना जापा काढने वाली इस ततैया को जिला जींद के निडानी, निडाना, ईगराह, ललित खेडा व् बराह कलां के किसान तरखान-ततैया व् खातिन आदि नामों से जानते हैं। अंग्रेज और हमारे कीट-वैज्ञानिक इस कीड़े को किस नाम से पुकारते हैं, हमें नही मालूम। नाम की तो छोड़ो, हमें तो इस कीड़े के खानदान और खरने तक के बारे में भी जानकारी नही। पर काम गजब का करती है यह ततैया। हमारी फसलों में कीट प्रबंधन का काम अर वो भी बिना कीटनाशकों के इस्तेमाल के। इसका यह काम तो हमने निडानी के कृष्ण की कपास की फसल में अपनी आँखों से देखा है।  रंग-रूप व् झामा से सिर के कारण यह काली सी ततैया इंजनहारियों वाले खानदान के मुकाबले भीरड़ों के ज्यादा नजदीक प्रतीत होती है। पतली कमर वाली सुन्दर-सलौनी ये ततैये देखने में तो शरीफ व् नाजुक सी लगती हैं, लेकिन काम में बेजोड़ मेहनती व् चुस्त होती हैं। इनका सिर व् माथा शरीर की तुलना में काफी बड़ा होता है तथा इनके जबड़े और भी मजबूत। तभी तो बथवे की डाली में सुरंग का निर्माण कर पाती हैं। दिन-रात मेहनत करके ही बथवे के तने में सुराख़ कर पाती और फिर इसके अंदर की लुगदी को इधर-उधर ठिकाने लगाकर अपने बच्चों के लिए दर्जनों प्रकोष्ठों का निर्माण करती है। इनमें फसलों से छोटे-छोटे कीट उठाकर लाती है। उन्हें जहरीले प्रोटीनों की सहायता से लुंज करती है। और 10-12 की संख्या में हर प्रकोष्ट में रख देती है। फिर सभी प्रकोष्ठों एक-एक कर के अंडे देती है। इसके नवजात इन भंडारित कीड़ों को खा-पीकर ही बड़े होते हैं और इन प्रकोष्ठों में ही पुपेश्न करते है। प्युपेसन के बाद यह कीट प्रौढ़ के रूप में विकसित होकर स्वंतंत्र जीवन जीने के लिए एक-एक करके बथुवे के तने से बहार निकलते हैं. नर के साथ  मधुर मिलन के बाद सारा काम मादा ततैया ही करती है। नर ततैया तो बथुवे की डाली या आस-पास बैठ कर इस सुरंग की पर नजर रखता है ताकि मादा की इस बेजोड़ मेहनत पर कोई अन्य ततैया पानी न फेर जाये. महिला सशक्तिकर्ण की इस नायब प्रतीक ततैया को शायद इसीलिए खातिन के नाम से पुकारना जायज मानते हैं निडाना-निडानी के किसान।

Sunday, August 28, 2011

बांसिया बुग्ड़ा

 बांसिया बुग्ड़ा कपास की फसल में पाया गया एक छोटा सा कीड़ा है. छरहरे बदन के इस कीड़े की टांगें अत्याधिक लम्बी व् धागेनुमा होती है. इस कीड़े के एंटीना भी बहुत लम्बे होते हैं. इतनी लम्बी टांगों व् एंटीना के बावजूद इस कीड़े के शरीर की लम्बाई बामुश्किल सात से दस मि.मी. ही होती है. Lygaeidae कुटुंब की Jalysus जाती के इस बुग्ड़े की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं. कुछ प्रजातियाँ तो शाकाहारी होती हैं और कुछ प्रजातियाँ आंशिक तौर पर परभक्षी होती हैं. शाकाहारी बुग्ड़े कपास, मक्की, टमाटर, तम्बाकू व् घिया-तोरी आदि के पौधों की पत्तियों की निचली सतह से रस चौसन कर गुज़ारा करती हैं.

     इस कीट द्वारा फसलों में हानि पहुचाने की कोई शिकायत ना तो कभी किसी किसान ने और ना ही किसी कीट-विज्ञानी ने कहीं दर्ज करवाई है. शायद इसीलिए इस कीट की गिनती कपास के मेजर या मायनर कीटों में होना तो दूर की कौड़ी. कीट विज्ञानिक तो कपास की फसल में हानि पहुँचाने कीटों में इस बांसिया बुग्ड़े का जिक्र करना भी मुनासिब नही समझते. करें भी कैसे जब ये बांसिया बुग्ड़े अपने वजूद का अहसास ही नही करा पाते. लेकिन हकीकत यह भी है कि रूपगढ, राजपुरा, इग्राह, निडाना, निडानी, ललित खेडा, भैरों खेडा व् बराह कलां की खेत पाठशालाओं में कपास की फसल में इस कीट को देख चुके हैं.
    

Wednesday, August 24, 2011

कपास में कुण्डलक कीड़ा

          कपास की फसल में कुण्डलक कीड़ा एक ऐसा पर्णभक्षी कीट है जिसकी गिनती कपास के नामलेवा से कीटों में भी नही होती। यानीकि कपास की फसल में इसका प्रकोप कभी-कभार ही देखने में आता है। खेत में इसके आगमन की शुरुवात किनारों से ही होती है। इस कीट की सुंडी  विविध किस्म के पौधों की पत्तियां खा-पीकर अपना जीवन निर्वाह करती हैं। यह सुंडी पत्तों की नसों के बीच की  जगह को खाती है परिणामस्वरुप पत्ता नसों का ढांचा भर रह जाता है और अंत में झड़ जाता है। कपास की फसल में टिंडे पकने के समय इस तरह से पत्तों का झड़ जाना टिंडों तक रोशनी पहुँचने का रास्ता साफ करता है। और इस तरह से टिंडे खिलने में सहायक होता है। 
.                                          इस कुण्डलक का वयस्क 1"x1.5" के आकार का एक धब्बेदार भूरे रंग का पतंगा होता है। इसकी आगे वाली पंखों के मध्य भाग में चाँदी रंगे दो निशान होते हैं। देखने में ये निशान  V या 8 जैसे दिखाई देते हैं। पीछे वाले पंख पिलाकी लिए भूरे रंग के होते हैं। किनारों पर यह रंग गहरा होता है। पतंगा नर हो या मादा, इनके पेट के अंतिम छोर पर बालों का गुच्छा होता है। इस कीड़े की मादा पतंगा अपने जीवन काल में सामान्य परिस्थितियों में लगभग 200-250 अंडे देती है। अंडे एक-एक करके पत्तियों की निचली सतह पर दिए जाते हैं। चपटे एवं अर्धगोलाकारिय इन अण्डों का रंग सफ़ेद होता है। अंडविस्फोटन होने में चार से छ: दिन लग जाते  हैं. इस कुंडलक की नवजात सुंडियां पूर्ण रूपेण विकसित होने के लिए अपने जीवनकाल में पांच बार कांजली उतारती हैं। भोजन की उपलब्धता व् मौसम की मेहरबानी मुताबिक ये सुंडियां पूर्ण विकसित होने के लिए दो से चार सप्ताह का समय लेती हैं। हलके हरे रंग की यह सुंडी पूर्ण विकसित होने पर दो इंच तक लम्बी हो जाती है. प्युपेसन या तो पत्तों की निचली सतह पर या फिर पत्तों के मुड़े हुए किनारों के अंदर। प्युपेसन जमीन पर पड़े पौधों के मलबे में भी होती है। इस कीट की यह प्युपेसन अवधि आठ-दस दिन की होती है।
हमारे फसलतंत्र  में इस कीट के अंडे व् नवजात सुंडियों को खाने के लिए लेडी बीटल की दर्जनों, कराईसोपा की दो व् मांसाहारी बुग्ड़ों की दस प्रजातियाँ मौजूद रहती हैं। इस कीट की सुंडियों से अपना पेट भरने वाले कम से कम आठ किस्म के तो हथजोड़े ही किसान कपास के खेतों में देख चुके हैं। इस कीट के पतंगों को हवा में गुछ्ते हुए लोपा व् डायन मक्खियों को किसान स्वयं अपनी आँखों से देख चुके हैं। इस कीट के अण्डों में अपने बच्चे पलवाने वाली दुनिया भर की सम्भीरकाएं भी हमारे फसलतंत्र में पाई जाती हैं। कपास के खेतों में मकड़ियां भी इस कीट को खाते हुए किसानों ने देखी हैं।
किसानों का कहना है कि जब हमारे खेतों में कीट नियंत्रण के लिए कीटनाशकों के रूप में इतने सारे कीट प्राकृतिक तौर पर पाए जाते हैं तो हमें बाज़ार से खरीद कर कीटनाशकों के इस्तेमाल की आवश्यकता कहाँ है?

Sunday, August 14, 2011

कपास में पत्ता-लपेट सुंडी

कपास की फसल में पाई जाने वाली यह पर्णभक्षी पत्ता-लपेट सुंडी है तो एक नामलेवा सा कीड़ा पर भारत के सभी कपास उगाऊ क्षेत्रों में पाया जाता है. पर यह छिटपुट की सुंडी भी कभी कभार किसानों को नानी याद दिला देती है। अंग्रेजी में इस कीड़े को Cotton leaf-roller कहते हैं। कीट वैज्ञानिक इसे वैज्ञानिक भाषा में Lepidoptera वंशक्रम के Pyralidae परिवार की Sylepta derogata कहते हैं।
          इस कीट के पतंगें माध्यम आकार के तथा पीले से पंखों वाले होते हैं। इन पंखों पर भूरे रंग की लहरिया लकीरें होती हैं। पतंगे के सिर व् धड़ पर काले व् भूरे निशान होते हैं। पूर्ण विकसित पतंगे की पंखों का फैलाव लगभग 28 से 40 मि.मी. होता है। अन्य पतंगों की तरह ये पतंगें भी निशाचरी होते हैं। रात के समय ही मादा पतंगा एक-एक करके तकरीबन 200 -300 अंडे पत्तों की निचली सतह पर देती है। इन अण्डों से चार-पांच दिन में शिशु सुंडियां निकलती हैं। ये नवजात सुंडियां अपने जीवन के शुरुवाती दिनों में तो पत्तियों की निचली सतह पर भक्षण करती हैं।पर बड़ी होकर ये सुंडियां पत्तियों को किनारों से ऊपर की ओर कीप के आकार में मोड़ती हैं तथा इसके अंदर रहते हुए ही पत्तियों को खुरच कर खाती हैं। ये सुंडियां अपने वृद्धिकाल में छ: या सात बार कांजली उतारती हैं। इस कीट की यह लार्वल अवस्था लगभग 15 -20 दिन की होती है. यह कीड़ा अपनी प्यूपल अवस्था पौधों पर या फिर इन मुड़ी हुई प्रोकोपित पत्तियों के अंदर ही या फिर जमीन पर पौधों के मलबे में पूरी करता है। इस कीड़े को अपना ये प्यूपल-काल पूरा करने में आठ-दस दिन लग जाते हैं। इस कीट के प्रौढ़ सप्ताह भर जीवित रहते हैं। अपना जीवन सफल बनाने के लिए एक सप्ताह के अंदर-अंदर ही इन प्रौढ़ नर व् मादाओं को मधुर-मिलन भी करना होता है तथा मादाओं को अंड-निषेचन भी करना होता है।
खाने और खाए जाने  के इस स्वाभाविक काम में इन्हें भी खाने वाले अनेकों कीट कपास की फसल में पाए जाते हैं। कातिल बुग्ड़े, छैल बुग्ड़े, सिंगू बुग्ड़े, दिद्दड़ बुग्ड़े, बिंदु बुग्ड़े व् दस्यु बुग्ड़े इस कीट की सुंडियों का खून व् अण्डों का जीवन-जूस पीते हैं। विभिन्न प्रकार की लेडी बीटल इसके अण्डों व् तरुण-सुंडियों का भक्षण करती हैं। लोप़ा मक्खियाँ इसके प्रौढ़ों का शिकार करती हैं। हथजोड़े के प्रौढ़ एवं बच्चे इस कीट की सुंडियों का भक्षण करते हैं। कोटेसिया नामक सम्भीरका इस कीट की सुंडियों के पेट में अपने बच्चे पालती है।

Friday, August 5, 2011

तम्बाकूआ-सुंडी

प्रौढ़ पतंगा 
सुंडी 
तम्बाकूआ-सुंडी सामनी के समय म्हारे हरियाणा में कपास के साथ-साथ अरहर व् डैंचा के पौधों पर दिखाई देने वाला एक पर्ण-भक्षी कीड़ा है।  इस सुंडी को कीट-वैज्ञानिक Spodoptera litura कहते-लिखते हैं। अंग्रेज इसे टोबैको केटरपिलर के नाम से पुकारते हैं. इसके परिवार को Noctuidae व् वंश-क्रम को Lepidoptera कहा जाता है। इस कीड़े का आगमन कपास की फसल में कमोबेस प्राय हर साल ही देखने में आता है। फसल में पत्तों को खा लेना भी नुकशान है तो यह काम इस कीड़े की सुंडियां ही करती हैं। शुरुवाती काल में ये सुंडियां झुण्ड में रहकर पत्ती की निचली सतह खुरच कर खाती हैं। परिणामस्वरूप पत्तियों का ढांचा भर रह जाता है। बाद में ये सुंडियां तितर-बितर हो जाती हैं और रात में अकेली घुमने लगती हैं। अब ये पत्तों के अलावा कलियों, फूलों, पंखुड़ियों को भी खा जाती हैं। ये सुंडियां खा-पीकर 3.5 से 4.0 सै.मी. तक लम्बी हो जाती हैं। इनका शरीर मखमली काला होता है जिसकी पीठ पर पीली-हरी धारियाँ होती हैं व् अगल-बगल में सफेद बैंड होते हैं। इस कीड़े के ये भूरे-सुनैहरी प्रौढ़ बड़े सुन्दर दिखाई देते हैं। प्रौढ़ पतंगे की लम्बाई 22 मि.मी. व् इसके पंखों का फैलाव तक़रीबन 40 मी.मी. होता है। इस कीड़े की प्रौढ़ मादाएं अपने जीवन काल में 1000 -1200 अंडे देती हैं। ये अंडे पत्तियों की निचली सतह पर किनारों के पास गुच्छों में दिए जाते हैं। प्रत्येक गुछे में 70 -100 अंडे होते हैं। अण्डों के ये गुछे पीले रंग की गंदगी और रोओं से ढके रहते हैं।  इन अण्डों से 4-5 दिन में इस कीट की सुंडियां निकलती हैं। ये सुंडियां छ: अंतर्रुपों से गुजरते हुए प्युपेसन में जाने तक लगभग 15 से 30 दिन का समय ले लेती हैं। इस कीट की प्यूपल अवस्था जमीन के अन्दर 10 -12 दिन में पूरी होती है। इस पतंगे का प्रौढीय जीवन सात-आठ दिन का होता है। कपास के साथ-साथ तम्बाकू, अरंड, चना, मिर्च, बंदगोभी, फूलगोभी , मूंगफली. अरहर व् दैंचा आदि के पौधों पर भी बखूबी फलती-फूलती पाई जाती है, ये तम्बाकूआ-सुंडी। 
भक्षण
इस कीड़े की विभिन्न अवस्थाओं के सहारे अपना जीवन निर्वाह करने वाले दुनिया भर के मांसाहारी कीट भी हरियाणा के कपास परितंत्र में मिल जायेंगे। निडाना के किसानों ने अपने कपास के खेतों में कई किस्म की लेडी बीटल देखली जो इस कीट के अंडे व् तरुण सुंडियां खाकर जीवन की गाड़ी को आगे बढाती हैं। इन्होने इनके अण्डों व् सुंडियों का जीवन रस पीते हुए कातिल बुग्ड़े, सिंगू बुग्ड़े तथा इनके बच्चे देख लिए। इस कीट के प्रौढ़ पतंगों का उड़ते हुए शिकार करती लोपा-मक्खी व् डायन-मक्खी मौके पर देख चुके हैं। ये किसान. इस तम्बाकूआ-सुंडी को परजीव्याभित करते ब्रेकन सम्भीरका व् इसके कोकून देख चुके हैं। इन कोकुनो से कोटेसिया को बाहर निकलते भी निडाना के किसान अपनी आँखों से देख चुके हैं। इन तम्बाकूआ-सुंडियों का भक्षण करते हुए नौ किस्म के हथजोड़े(Praying mantis) भी किसान देख चुके हैं। जब किसानों ने एक हथजोड़े के साथ तीन तम्बाकूआ-सुंडियों को शीशी में रोक दिया तो इन तीन पर्णभक्षी सुंडियों ने मिल कर इस मांसाहारी कीट हथजोड़े को खा लिया. शायद अपनी जान बचाने के लिए।
कपास के खेतों में मकड़ियां भी इस कीट को खाते हुए किसानों ने देखी हैं।
किसानों का कहना है कि जब हमारे खेतों में कीट नियंत्रण के लिए कीटनाशकों के रूप में इतने सारे कीट प्राकृतिक तौर पर पाए जाते हैं तो हमें बाज़ार से खरीद कर कीटनाशकों के इस्तेमाल की आवश्यकता कहाँ है?
       अब एक सवाल आपसे? जवाब चाहिये।
                         यह पर्णभक्षी कीड़ा हमारे यहाँ कपास की फसल में सितम्बर व् अक्तूबर के महीनों में क्यों आता है जबकि इसके खाने लायक पत्ते तो कपास की फसल में शुरुआत से ही होते हैं।





Sunday, September 5, 2010

जयन्तु- एक परभक्षिया कीटनाशी



राम का घोड़ा ! ना.. बाबा.. ना। यू तो नेता जी सै, पाछले जन्म में हाथ जोड़न की बाण कौन गई - हथजोड़े की । यू जो भी सै, सै पक्का छलिया। देखन में दूब बरगा अर दोनों हाथ जोड़े खड़ा| सिर पर इसकै ताज! मांस खाना मुख्य काज!! फेर तो यू ना राम का घोड़ा अर ना हथजोडा। यू तो होया नमस्ते करकै मारणिया - नमन्तु या जयन्तु । अंग्रेज तो इसनै प्रेइंग मेँटिस कह्या करे। कहण का के सै। कहण नै तो म्हारे बडे-बूढे भी इसकी अंडथैली नै गादड़ की सुंडी कह्या करै। पाड़ लो नै पुन्ज़ड । छोडो नाम, नाम में के धरया सै। इसका काम बताओ?
काम तो इसका एक्के सै। मांस खाणा अर बालक जामणा। आमतौर पर इनके भोजन में मकडी, मक्खी, मच्छर, अल, तेला, चुरडा, तितली, पतंगा, भंवरा, भुंड और सुंडी आदि कीट शामिल होते हैं। पर विशाल प्रजाति के हथजोड़े छोटी-छोटी छिपकलियों, मेंढ़कों, पक्षियों, सांप, मछली और मूषकों तक को भी खाते देखे गये हैं| कुछ फंस ज्याओ , उसे नै रगड़ दे सै। और तो और आगै की होंदे ही अपने मर्द नै भी खा जा सै। सै सही खसमखाणी। खसमखाणी बेशक हो, पर बालक इसने भी बहुत प्यारे लागै सै। इसीलिए तो या रांड अपनी मजबूत अन्डथैली को झाड, कीकर, कैर, हिंस तथा जांडी आदि कंटीले पौधों की टहनियों पर ही चिपकाया करती है । पर यह क्या ? अबकी बार तो इस नै अन्डथैली कांग्रेस घास की टहनियों पर चिपकाई सै। पता सै क्यूँ ? क्योंकि अन्डथैली से निकलते ही इसके नवजात शिशुओं को कांग्रेस घास पर मिलीबग व उसके बच्चे खाणे को मिलेंगे। मैक्सिकन बीटल के प्रौढ़ और गर्ब खाने को मिलेंगे. अर वो भी भरपेट !! इस साल तो इस कीटखोर की अंडेदानी ललित खेडा गाम के राम देवा के खेत में धान की फसल में भी देखी गयी है| निडानी के किसानों ने तो इसकी ये अंडेदानियाँ खरपतवार कहे जाने वाले बथुवा व् मिर्ची-बूटी के पौधों पर भी देख ली. इसका सीधा सा मतलब हुआ कि जहाँ बच्चों के लिए भोजन का जुगाड़ हो - वही अपनी अंडेदानी चिपका दी.
सुना है दुनिया भर में इस कीटखोर की 2200 प्रजातियाँ पाई जाती हैं| पर निडाना गावं में तो अब तक किसान इसकी 7 प्रजातियाँ ही देख पाए हैं| महिला खेत पाठशाला, निडाना (जींद, हरियाणा) की महिलाओं ने कीट नियंत्रण में इस गजब के कीटखोर की कीटनियंत्रण में महती भूमिका को मध्यनजर रखते हुए एक हरियाणवी गीत की रचना की है तथा इस गीत को विभिन्न अवसरों पर इसे गाया भी है. 
तीसरा मौका: गावं में खेत दिवस.








Wednesday, July 29, 2009

प्राकृतिक कीटनाशी - डायन मक्खी

टिड्डे का शिकार करती डायन मक्खी।
जिला जींद के फसलतंत्र में किसान मित्र के रूप में डायन मक्खी भी पाई जाती हैं. जी, हाँ! , राजपुरा ईगराह रूपगढ, निडाना व ललित खेडा के किसान तो इसे इसी नाम से जानते हैं जबकि अंग्रेज इसे Robber Fly कहते हैं. नामकरण की द्विपदी प्रणाली के अनुसार यह डायन मक्खी, Dipterans के Asilidae परिवार की Machimus प्रजाति है.
डायन मक्खी घोर अवसरवादी एवं प्रभावशाली परभक्षी होती है. डायन मक्खी के ये गुण इसके शारीरक ढांचे में निहित होते हैं. इन मक्खियों की टांगें काफी मजबूत होती हैं. ऊपर से इन पर कसुते कांटे होते हैं. इनके माथे पर दो जटिल एवं विशाल आँखों के मध्य खास खड्डे में तीन सरल आँखें भी होती हैं. अपनी इन आँखों व् टांगों के कारण ही ये मक्खियाँ शिकार का कोई अवसर हाथ से नही जाने देती. इनके चेहरे पर कसुते करड़े बालों वाली मुच्छ होती हैं जो मुठभेड़ के समय इनके बचाव के काम आती हैं.
टिड्डे को बेहोश करती डायन मक्खी।
 शिकार फांसने के लिए लुटेरों जैसी रणनीति के कारण ही शायद इन्हें डायन या डाकू मक्खी कहा जाने लगा. डायन  मक्खी अपने अड्डे से शिकार करती हैं. ये  मक्खी अपना अड्डा खुली एवं धुप वाली जगह बनाती हैं. अड्डे की जगह पौधों की टहनी, ठूंठ,  पत्थर व ढेला आदि कुछ भी हो सकती है. इस मचान पर बैठ कर ही यह मक्खी अपने शिकार का इंतजार करती रहती है. यहाँ से गुजरने वाले शिकार पर झपटा मरने के लिए इस मचान से उड़ान भरती हैं. कीट वैज्ञानिकों का कहना हैं कि यह डायन मक्खी अपनी टोकरिनुमा कांटेदार टांगों से ही उड़ते हुए कीटों को काबू करती हैं. हमने तो इस मक्खी को कई बार जमीन पर बैठे - बिठाए टिड्डों को भी झपटा मार कर अपनी गिरफ्त में लेते हुए देखा है.
टिड्डे का खून पिते हुए डायन मक्खी।
शिकार को पकड़ते ही, डायन अपना डंक उसके शरीर में घोपती है व इस डंक के जरिये ही वह शिकारी के शरीर में अपनी लार छोड़ती है. इस लार में एक तो ऐसा जहरीला प्रोटीन होता है जो तुंरत कारवाई करते हुए शिकार  के स्नायु- तंत्र को सुन्न करता है तथा दूसरा एक ऐसा पाचक प्रोटीन होता है जो शिकार के शरीर के अंदरूनी हिस्सों को अपने अंदर घोल लेता है. इन घुले हुए हिस्सों को डायन मक्खी ठीक उसी तरह से पी जाती हैं जैसे कोई बड़ा - बुड्डा दूध में दलिया घोल कर पी जाता है.
इनके भोजन में मक्खी, टिड्डे, भुंड, भिरड, बीटल, बग़, पतंगे व तितली आदि कीट शामिल होते हैं. डायन मक्खी कई बार अपने से बड़े जन्नोर का शिकार भी कुशलता से कर लेती हैं.