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Wednesday, July 25, 2012

ईंख में काला बुग्ड़ा

Cavelerius excavatus Dist.
हरियाणा में इस कीट को काली भुंडी या काली कीड़ी कहा जाता है। क्यों? यह हम्में भी मालूम नहीं। पर यह पक्का पता है कि अंग्रेज इसे black bug कहते है।  कीट विज्ञानी इस कीड़े को अपनी भाषा में Cavelerius excavatus Dist. पुकारते हैं। वे इसका वंशक्रम Hemiptera व् कुटुंब  Lygaeidae बताते हैं। लम्बौतरे बदन वाले इस काले कीट के प्रौढ़ की टांगों का रंग बादामी व् पंखों का रंग कहीं से सफ़ेद तथा कहीं से काला होता है। पंखों पर बादामी रंग के W व् Y चिन्ह होते हैं। इसके शिशु शारीरिक बुनावट में तो अपने प्रौढ़ों के समान होते हैं पर आकार छोटा होता है। ये शिशु काले व् गुलाबी रंगों की छटा लिए पंखविहीन होते हैं।  इस कीट के प्रौढ़ व निम्फ दोनों ही ईंख की फसल में पर्णचक्करी में छुपकर रहते हैं व् पत्तों से रस चूस कर अपना पेट पालते हैं। ईंख के पत्तों से इन द्वारा रस चूसने के कारण, निसंदेह पौधों में रस की मात्रा कम हो जाती है पर सामान्य परस्थितियों में पौधे अपनी क्षतिपूर्ति क्षमताओं के चलते इस कमी को पूरा कर लेते हैं। पर इस कीड़े को गर्म व् शुष्क मौसम ज्यादा माफ़िक बैठता है। इसीलिए हरियाणा में यह कीट मई -जून के महीनों में ज्यादा दिखाई देता है। पहले मोढ़ी में दिखाई देता है व् बाद में बौअड़ में। सूखे व् रूखे हालात में ही इस कीड़े का रस पीकर गुज़ारा करना ईंख की फसल व् फसल के मालिक को महंगा पड़ सकता है। फसल अपनी इस पीड़ा को अपने पत्तों का रंग हल्दिया कर अपने मालिक को मदद के लिए गुहार लगाती है। सिंचाई के साथ-साथ अगर जिंक-यूरिया-डी.ए.पी. के 5.5% घोल का स्प्रे हो जाये तो पौधे इस रस हानि क़ी क्षतिपूर्ति कर लेते हैं।    ईंख के अलावा यह मक्की, धान व् कई तरह के घासों पर भी गुज़ारा कर लेता है।

Friday, August 5, 2011

सांवला मत्कुण

सांवला मत्कुण की गिनती कपास की फसल में हानि पहुचने वाले छिट-पुट कीटों में होती है. इस कीड़े का जिक्र तो कपास के फोहे खराब करने के लिए या घरों में भण्डारण के समय इंसानों को दुखी करने के लिए ज्यादा किया जाता है. कपास की लुढाई के समय इस कीट के प्रौढ़ों व् निम्फों का साथ पिसा जाना, रूई को बदरंग कर देता है. इस कीड़े को अंग्रेज लोग Dusky Cotton bug कहते हैं जबकि कीट- वैज्ञानिक इसे Oxycarenus laetus के नाम से जानते हैं. Hemiptera वंश के इस कीट के कुनबे को Lygaeidae कहा जाता है.
इस कीड़े के प्रौढ़ों का रंग गहरा भूरा होता है. इनके शरीर की लम्बाई बामुश्किल चार-पांच मी.मी. होती है. इस कीड़े के पारदर्शी पंखों का रंग धुंधला सफ़ेद होता है. इसके युवा शिशुओं का पेट गोल होता है. ये निम्फ शारीरिक बनावट में अपने प्रौढ़ों जैसे ही होते हैं पर इस अवस्था में पंख नही होते. चौमासा शुरू होने पर इस कीड़े की सिवासिन मादाएं कपास के अर्धखिले टिंडों में अंडे देती हैं. अर्धखिले टिंडों में फोहों पर ये अंडे एक-एक करके भी रखे जा सकते हैं और गुच्छो में भी. शुरुवात में इन अण्डों का रंग झकाझक सफ़ेद फिर पीला व् अंत में अंड-विषफोटन से पहले गुलाबी हो जाता है. ताप व् आब की अनुकूलता अनुसार इन अण्डों से 5 से 10 दिन में निम्फ निकलते हैं. इनका यह निम्फाल जीवन तकरीबन ३५ से ४० दिन का होता है. इस दौरान ये निम्फ छ: बार कांजली उतारते हैं. इस कीड़े के प्रौढ़ एवं निम्फ, दोनों ही टिंडों में कच्चे बीजों से रस चूसते हैं जिसके परिणामस्वरुप कपास का वजन घटता है और पैदावार में कमी आती है पर खड़ी फसल में यह नुकशान नज़र नही आता. इसीलिए तो हरियाणा में कोई भी किसान इस कीट को काबू करने वास्ते कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हुए प्रयासरत नजर नही आता.
बी.टी.कपास के जरे-जरे में मौजूद जहर के पक्षपाती होने के कारण कब कौनसा रस चुसक कीट माईनर से मेजर बन बैठे, कहा नही जा सकता?








Friday, August 6, 2010

छैल-मक्खी - एक परभक्षिया कीटनाशी

छैल मक्खी अन्य छैल को खाते हिए।
आराम फरमाती छैल मक्खी
 छैल-मक्खी (Damsel fly) चौमासे (आमतौर पर जून, जुलाई और अगस्त) के दौरान विभिन्न फसलों में उड़ते हुए नजर आने वाली एक महत्वपूर्ण कीटखोर मक्खी है। हरियाणा में इसे तुलसा के नाम से जाना जाता है। लंबे, संकरे व पारदर्शी पंखों वाली ये मक्खियाँ कई रंगों में पाई जाती हैं। इन्हें लोपा-मक्खियों (Dragon flies) के मुकाबले कमजोर उड़ाकू माना जाता है। उड़ने की प्रतियोगिता में उपरोक्त कीटों की हार-जीत से किसानों का क्या लेना-देना। किसानों के लिये तो यह जानकारी फायदेमंद है कि इस छैल-मक्खी के प्रौढ़ व अर्भक, दोनों ही मांसाहारी होते है। यह मक्खी अपने अंडे खड़े पानी में देती है। पानी चाहे गावं के जोहड़ या जोहड़ी में हो या फिर धान के खेत में हो। इस कीड़े के अर्भक पानी में पाये जाने वाले मच्छर के लार्वा समेत उन अन्य सभी कीटों का शिकार कर लेते हैं जो आकार में इनके बराबर या छोटे हों। धान की फसल को हानि पहूँचाने वाले विभिन्न फुदकों का शिकार करने में इन्हें बहुत आनंद आता है। वैसे तो इस कीट के अर्भक पानी में रहते हैं लेकिन खाने के लिए अन्य कीड़ों की तलाश में धान के पौधों पर चढ़ने में इन्हें गुरेज नही होता। इस मक्खी की कुछ प्रजातियाँ तो मकड़ियों को भी खा जाती हैं, मकड़ी के जाले के पास मँडराते- मँडराते ही जाले में से मकड़ी को दबोच लेती हैं। भोजन के लिये अन्य कीड़ों का अभाव होने पर यह मक्खियाँ आपस में ही एक दूसरे को खा जाती हैं। शायद भोजन में इतनी विविधता के कारण ही भोजन श्रृंखला में इन्हे उच्चा दर्जा हासिल है।
आराम फरमाती छैल मक्खी।
रति रत जोड़े।
आराम

Tuesday, August 18, 2009

कपास में रस चुसक :- अष्टपदी

अष्टपदी या मकडिया-जूं , जिला जींद की कपास फसल में रस चूस कर हानि पहुँचाते पाया जाने लगा है। इस जीव की आठ टाँगे होती हैं इसीलिए तो इसे कीट नही कहा जाता। हाँ! वैज्ञानिकों की दुनिया में इस जीव को "Tetranychus sp." कहा जाता है। ये अष्टपदियाँ Tetranychidae नामक घुन परिवार से सम्बंधित हैं. इस परिवार में इन अष्टपदियों की हज़ार से भी ज्यादा प्रजातियाँ पाई जाती हैं. आमतौर पर ये महीन जीव अपनी सुरक्षा के  लिए पत्तों की निचली सतह पर रेशमी जाला बुनती हैं. शायद इसी गुण के कारण इन्हें मकडिया-जूं कहा जाता है. ये अष्टपदियाँ कपास की फसल में पत्तों की निचली सतह से रस चूस कर नुकशान पहुँचाती हैं। आकार में इतनी छोटी (बामुश्किल एक मिलीमीटर) होती हैं कि किसान को मुश्किल से ही दिखाई देती हैं। यूँ तो ये जीव लाल, हरी, सन्तरी या तिनका रंगी होती हैं पर पत्तों की निचली सतह पर धूल कण सी दिखाई देती हैं। सामान्य परिस्थितियों में इनकी जीवन यात्रा 9-10 दिन की होती है ।
गर्म व शुष्क मौसम इनके लिए ज्यादा अनुकूल होता है। याद रहे अष्टपदियाँ पत्तों, तनों व बौकियों से रस चूस कर पौधों को हानि पहुँचाती हैं। इससे पत्तों में क्लोरोफिल की भी कमी हो जाती है। वांछित भोजन ना मिलने के कारण पौधों की स्वाभाविक वृध्दि व् प्रजनन प्रक्रियाएं अवरुद्ध हो जाती हैं। पर स्वभाव से अष्टपदियाँ आक्रामक घुमंतू नही होती. इसका मतलब जिस पत्ते पर जन्म हुआ वहीं या एकाध साथ वाले पत्ते पर  गुज़ारा व् प्रजनन कर लिया. चेपों की तरह से इन्हें रसीली फुन्गलों में कोइ दिलचस्पी नही होती.
हमारी फसलों में इन  को खाने के लिए भान्त-भान्त के कीड़े पाए जाते हैं.
दस्यु बुगडा अपने भोजन में खाने के लिए अष्टपदियाँ मिलने को अपना सौभाग्य समझता है। छ: बिन्दुआ चुरडे तो इन अष्टपदियों को चट करते ही हैं। इन्हें तो रस चूसक चुरडे तक साफ कर जाते हैं। विभिन्न बिटलों के बच्चे भी इन अष्टपदियों को चाव से खाते हैं। इसीलिए तो इन अष्टपदियों के नियंत्रण के लिए किसी कीटनाशक का स्प्रे करने की आवश्यकता नही होती। कीटनाशकों के अनावश्यक स्प्रो से इन अष्टपदियों को खाने वाले कीट भी बेमौत मारे जाते हैं और फसल में अष्टपदियों का प्रकोप बेकाबू हो सकता है।

Monday, August 10, 2009

कपास सेधक कीट - सफ़ेद मक्खी

रस चोर सफ़ेद मक्खी का जिक्र चलते ही आज पत्ता नहीं क्यों 13 साल पहले 1986 में पढा हुआ यह नारा याद आ गया, "चिट्टे कबूतर ते नीले मोर, सारे चोर - सारे चोर." यह नारा गुरमुखी में लकड़ी जला कर बनाए गये कोयले से बुडैल जेल की एक बैरक में सफ़ेद दिवार पर लिखा हुआ था. इस दृश्य को ताजा करने में सफ़ेद शब्द की भूमिका रही या चोर की या दोनों की यह तो मैं भी तय नहीं कर पाया हूँ. पीले शरीर वाले इस छोटे से कीट की पंखों का रंग सफ़ेद होने के कारण यह सफ़ेद ही दिखाई देता है व पौधों से रस चुराने वाला तो है ही. इसका प्रौढ़ मुश्किल से 1,0 से 1,5 मिलीमीटर लंबा होता है. देखने में यह कीट मक्खी जैसा कम व पतंगे जैसा ज्यादा नजर आता है. इस सफ़ेद मक्खी का असली मक्खियों वाले डिप्टेरा नामक वंश से भी दूर--दूर तक कोई रिश्ता--नाता नहीं. फेर क्यूँ ,अंग्रेजों ने इस कीट का नाम सफेद मक्खी रखा ? -- मेरी समझ तै बाहर सै. अर् अनुवादकों ने भी इसका अनुवाद सफ़ेद मक्खी करके जमाँ--ऐ हिन्दी करण में हद करदी. शायद इसीलिए तो आज भी कपास की फसल में नामलेवा से हानिकारक कीट स्लेटी भुंड को ही सफ़ेद मक्खी समझने वाले किसानों की हरियाणा में कोई कमी नही. इस दुनिया में सफ़ेद मक्खी के कारण फसलों में हर साल होने वाले नुकशान के आंकड़े तो डालरों में आपको कहीं ना कहीं मिल जायेगें पर सफ़ेद मक्खी के नाम पर स्लेटी भुंड को मारने के लिए हरियाणा के किसानों द्वारा हरियाणा के जन्म से लेकर अब तक करोडों रुपये बेमतलब कीटनाशकों पर खर्च किए जाने का आंकडा कहीं नहीं मिलेगा. अब आप ही बताइये कि कीटों व किसानों की इस अंतहीन महाभारत में बिना निजी मुनाफे के क्यों कोई अर्जुन रूपी राणा अपना तीर इस आर्थिक निशाने पर मारेगा?
परिचय :
खिद्दवा से इस रस चूसक की गिनती अमेरिकन कपास की फसल में हानि पहुँचाने वाले खतरनाक कीटो में होती है. रस चूसने के अलावा भी यह कई तरह से अपने आश्रयदाता को नुकशान पहुँचाता है. एक तो इसके मल--मूत्र में मिठास होती है जो पौधों के पत्तों को चीड़-पड़ा कर देती है जिससे प्रकोपित पत्ते निस्तेज होकर मुरझा जाते हैं व पीले पड़ जाते हैं. इस चीड़--पड़े मल--मूत्र पर सूटी--मोल्ड उग आती है. इससे पौधों की भोजन बनाने की प्रक्रिया ही रुक जाती है. दुसरे कपास की फसल में मरोडिया नामक बीमारी के जिम्मेवार वायरस की वाहक भी होती है यह सफ़ेद मक्खी. लीफ कर्ल वायरस का एक पौधे से दुसरे पौधे में संक्रमण इस कीट की लार के मार्फ़त ही होता है.
कीट--वैज्ञानिकों की भाषा में इसको Bemisia tabaci कहा जाता है. इस कीट का कुल Hemiptera वंश में से Aleyrodidae होता है. अपने यहाँ अगर इसका नाम खिद्दवा या मच्छरोड़ होता तो शायद किसानों को भी इसे पहचानने में सहूलियत होती.
Pseudopupa
जीवन--यात्रा:
इस कीट का प्रजनन सारा साल चलता रहता है. इस कीट की प्रौढ़ मादा अपने जीवन काल में सौ--सवासौ अंडे देती है. अंडे पूर्ण खुली हुई फुंगली पत्तियों की निचली सतह पर एक--एक करके दिए जाते हैं. पाँच--छ: दिन के बाद, इन अण्डों से बच्चे निकलते है जिन्हें निम्फ कहा जाता है. निम्फ का आकार इंच का तीसवां हिस्सा ही होता है. ये निम्फ रस चूसने का सही स्थान ढूंढने के लिए ही नाममात्र को चलते है. फ़िर तो एक ही जगह पड़े--पड़े रस चूसते रहते हैं. पॉँच--छ: दिन की इस प्रक्रिया के बाद ये निम्फ स्यूडो--प्यूपा में तब्दील हो जाते हैं. एक सप्ताह में ही स्यूडो--प्यूपा प्रौढ़ के रूप में विकसित हो जाते है. इनका प्रौढिय जीवन आमतौर पर बीस--इक्कीस दिन का होता है.
भोजन श्रृंख्ला:
रस चूस कर गुजारा करने के लिए इस कीट वास्ते धरती पर कपास के अलावा फुल--गोभी, पत्त--गोभी, सरसों, तोरिया, मक्की, आलू, बैंगन, भिन्डी, मिर्च व टमाटर आदि पौधे मौजूद हैं. इसको खाने के लिए फसल--तंत्र में कराइसोपा, ब्रुमस, लेडी बीटल  व डैम्सैल मक्खियाँ मौजूद रहती हैं. दीदड़  व् एंथु जैसे विभिन्न मांसाहारी बुगडे भी इनका कल्याण कर डालते हैं.
Eretmocerus spp.
एन्कार्सिया व इरेट्मोसेरस नामक सम्भीरकायें इस कीट के निम्फों व स्यूडो--प्यूपा को परजीव्याभीत करते हुए पाई जाती हैं.

Tuesday, July 28, 2009

कपास में पुष्प-चर्वक कीट - तेलन

पुष्प पंखुड़ी भक्षण करती - तेलन
पुष्प पुंकेसर भक्षण करती - तेलन
उल्टी काण्ड पर तेलन
यह कीट ना तो तेली की बहु अर् ना इस कीट का तेली से कोई वास्ता फ़िर भी हरियाणा में पच्चास तै ऊपर की उम्र के किसान, अंग्रेजों द्वारा ब्लिस्टर बीटल कहे जाने वाले इस कीट को तेलन कहते हैं। हरियाणा के इन किसानों को यह मालुम हैं कि इस तेलन का तेल जैसा गाढा मूत अगर हमारी खाल पर लग जाए तो फफोले पड़ जाते हैं। इन किसानों को यह भी पता हैं कि पशु-चारे के साथ इन कीटों को भी खा लेने से, हमारे पशु बीमार पड़ जाते हैं। घोडों में तो यह समस्या और भी ज्यादा थी। एक आध किसान को तो थोड़ा-बहुत यह भी याद हैं कि पुराने समय में देशी वैध इन कीटों को मारकार व सुखा कर, इनका पौडर बना लिया करते। इस पाउडर नै वे गांठ, गठिया व संधिवात जैसी बिमारियों को ठीक करने मै इस्तेमाल किया करते। इस बात में कितनी साच सै अर् कितनी झूठ - या बताने वाले किसान जानै या इस्तेमाल करने वाले वैध जी। कम से कम हमनै तो कोई जानकारी नही।
हमनै तो न्यूँ पता सै अक् या तेलन चर्वक किस्म की कीट सै। कीट वैज्ञानिक इस नै Mylabris प्रजाति की बीटल कहते हैं जिसका Meloidae नामक परिवार Coleaoptera नामक कुनबे मै का होता है। इसके शरीर में कैन्थारिडिन नामक जहरीला रसायन होता है जो इन फफोलों के लिए जिम्मेवार होता है। इस बीटल के प्रौढ़ कपास की फसल में फूलों की पंखुडियों ,व्  पुंकेसर  को खा कर गुजारा करते हैं। कपास के अलावा यह बीटल सोयाबीन, टमाटर, आलू, बैंगन व घिया-तोरी आदि पर भी हमला करती है जबकि इस बीटल के गर्ब मांसाहारी होते हैं। जमीन के अंदर रहते हुए इनको खाने के लिए टिड्डों, भुन्डों, मैदानी-बीटलों व् बगों के अंडे एवं बच्चे मिल जाते हैं।
जीवन चक्र:
इस बीटल का जीवन चक्र थोड़ा सा असामान्य होता है। अपने यहाँ तेलन के प्रौढ़ जून के महीने में जमीन से निकलना शुरू करते है तथा जुलाई के महीने में थोक के भावः निकलते हैं। मादा तेलन सहवास के 15-20 दिन बाद अंडे देने शुरू कराती है। मादा अपने अंडे जमीन के अंदर 5-6 जगहों पर गुच्छों में रखती है। हर गुच्छे में 50 से 300 अंडे देती है। अण्डों की संख्या मादा के भोजन, होने वाले बच्चों के लिए भोजन की उपलब्धता व मौसम की अनुकूलता पर निर्भर करती है। भूमि के अंदर ही इन अण्डों से 15-20 दिन में तेलन के बच्चे निकलते है जिन्हें गर्ब कहा जाता है। पैदा होते ही ये गर्ब अपने पसंदीदा भोजन "टिड्डों के अंडे" ढुंढने के लिए इधर-उधर निकलते हैं। इस तरह से भूमि में पाए जाने वाले विभिन्न कीटों के अंडे व बच्चों को खाकर, ये तेलन के गर्ब पलते व बढते रहते है। अपने जीवन में चार कांजली उतारने के बाद, ये लार्वा भूमि के अंदर ही रहने के लिए प्रकोष्ठ बनते हैं। पाँचवीं कांजली उतारने के बाद, लार्वा इसी प्रकोष्ठ में रहता है। इस तरह से यह कीट सर्दियाँ जमीन के अंदर अपने पाँच कांजली उतार चुके लार्वा के रूप में बिताता है। यह लार्वा जमीन के अंदर तीन-चार सेंटीमीटर की गहराई पर रहता है। बसंत ऋतु में इस प्रकोष्ठ में ही इस कीट की प्युपेसन होती है। और जून में इस के प्रौढ़ निकलने शुरू हो जाते हैं।

Sunday, May 10, 2009

THE MEALYBUG CARCASS & PARASITOIDIC WASP

This is full grown larva of a tinny wasp called locally as ANGIRA say Aenasius spps. that was feeding upon the mealybug from inside

THE MEALYBUG KILLER
Originally uploaded by dalal.surender
.This has bee scissored out from inside the body of a mealybug by the farmers of Nidana with the help of their nails in the cotton field. See the mummified body of mealybug which had turned dark brown because of feeding by this larva from the inside.

Monday, March 23, 2009

कपास सेधक कीट मिलीबगः संक्षिप्त परिचय

सिवासण मिलीबग
कपास पर मिलीबग
टमाटर पर मिलीबग
धतूरे पर मिलीबग


हिन्दुस्तान में अंग्रेजी के अखबार दि ट्रिब्यून के संपादक की 24 नवंबर,2001 को अंग्रेजी में डांट खा कर, अमेरिकन सूंडी ने यहाँ अब तक दोबारा गर्दन उठाने की हिमाकत नही की है। पर बी.टी. बीजों के प्रचलन के साथ ही हमारी कपास की फसल में एक नया हानिकारक कीड़ा नजर आने लगा। 2007 में इस कीट की गिनती कपास के प्रमुख सेधक कीटों में होने लगी। कीट वैज्ञानिकों ने इसकी पहचान फिनोकोकस सोलेनोप्सिस नामक मिलीबग के रुप में की। किसान इसे मिलीबग, मिलीभगत, फुही आदि नामों से पुकारने लगे। कपास की खेती में अचानक आई इस नई मुसिबत को मिडिया कर्मियों ने "कपास का भस्मासुर" नाम दे दिया। सोलेनोप्सिस नामक यह मिलीबग मूलतः अमेरिका का निवासी है। अमेरिका में ही सबसे पहले इस कीड़े को सन् 1897 में टिंस्ले ने सजावटी पौधों पर देखा था। कपास की फसल में भी इस कीट को पहली बार 1990 में अमेरिका में ही देखा गया। फ्यूच व उसके मित्रों ने इस तथ्य की पुष्टि की थी। अब तो अर्जेंटिना, ब्राजील, घाना, नाइजीरिया, इस्राइल, पाकिस्तान, भारत, इन्डोनेशिया, थाइलैंड व चीन आदि देशों में कपास की फसल पर आक्रमण करते हुए यह मिलीबग आम पाया जाता है।
कपास का यह भस्मासुर एक बहुभक्षी कीट है। हरियाणा में किसानों ने इस मिलीबग को कपास के अलावा कांग्रेस-घास, चौलाई, साँठी, कचरी, भम्भोले, अक्संड, कंघी-बुटी, आवारा-सूरजमुखी, उल्ट-कांड, बाजरी, धतूरा, भूमि-आंवला आदि गैरफसली पौधों पर फलते-फूलते हुए देखा है। भिंडी, बैंगन, टमाटर आदि सब्जियों की फसल पर इस कीट का प्रकोप यहाँ आम बात हो गई है। चाईना-रोज जैसे सजावटी पौधे पर यह कीट देखा गया है| हिंस, नीम पीपल जैसे दरखतों पर भी जींद शहर में इस कीट को देखा गया है। पाकिस्तान में तो पौधों की 154 प्रजातियों पर इस रस चूसक कीट की उपस्थिति दर्ज की गई है। 

पहचान और जीवनचक्रः
सिवासण मिलीबग।

मादाः इस मिलीबग की मादाएं पंखहीन होती हैं। इनका अंडाकार शरीर 3-4 मि.मी. लंबा होता है। मादा मिलीबग का यह शरीर सफेद रंग के मोम्मियाँ पाऊडर से ढ़का रहता है। मादा मिलीबग के शरीर पर यह पाऊडर जल विकर्षक का काम करता है। इस मादा मिलीबग की धड़ और पेट पर काले धब्बे होते हैं जो गहरी अनुदैर्ध्य (longitudinal) लाइनों के रूप में दिखाई देते हैं। सिवासण मादा मोम्मिया अंडेदानी में 150 से 600 तक अंडे देती हैं। मादा इस अंडेदानी को अपनी छाती के निचे छुपा कर रखती है। 3 से 9 दिनों में इन अंडों से निम्फ निकलते हैं। मिलीबग के ये निम्फ बहुत चंचल व सक्रिय होते हैं तथा इन्हें क्रॉलर के नाम से जाना जाता है। मिलीबग की यह निम्फल अवस्था बीस-बाईस दिन की होती है|

गाभरु मिलीबग।
मधुर मिलन

नरः इस मिलीबग के बालिग नर 1 मि.मी. लंबे होते हैं। इनका शरीर भूरे रंग का होता है। इनके एक जोड़ी पारदर्शी पंख होते हैं। इनके पेट के अंत से सफेद मोम के दो तन्तु से निकले रहते हैं जो उड़ान के दौरान संतुलन साधने में सहायक होते हैँ। अविकसित मुखांग होने के कारण ये बालिग नर कुछ खा-पी नही सकते। इन नरों की उमर बामुश्किल दो-ढ़ाई दिन की ही होती है। इस दौरान मादाओं के साथ सहवास करने के अलावा इनके पास कोई काम नही होता।







Sunday, March 22, 2009

किसान मित्र - कोटेसिया

मैं, कोटेसिया नाम की सम्भीरका हूँ। इस जगत में स्वतंत्र जीवन जीने के लिए अपने कोकून से निकली ही थी कि जिला जींद के निडाना गावँ में कैमरे में कैद कर ली गयी। कैद का मतलब कथा-आत्मकथा लिखने का सुनैहरीअवसर। बेवारसा जाना तो हमारे समाज में भी अच्छा नही माना जाता। पर इन्सानों की तरह अतिरक्त उत्पादन तो दूर की बात, हमें तो भोजन संग्रह तक नही करना पडता।हमारे कीट समाज में तो पैदावार के नाम पर बस प्रजनन ही होता है। इसीलिए तो मेरा और मेरे मर्द का रिश्ता-नाता सिर्फ़ मधुर मिलन तक सिमित होता है। और तो और मेरा व बच्चों का रिश्ता भी अंडे देने के साथ ही समाप्त हो जाता है। अण्डों से निकले मेरे बच्चों को अपना बाप का पता नही होता। उन बेच्चारों को तो अपनी माँ का भी पता नही होता। अपने बच्चों के लिए भोजन व आवास के पुख्ता प्रबंधन वास्ते एक अदद सुंडी को ढुँढ लेना ही हमारे जीवन की सफलता माना जाता है। आजादी की ली दो साँस और फ़िर किया सहवास। ढुँढी एक पली पलाई सुंडी तथा अंडनिक्षेपक की सहायता से घुसेड़े इसके शरीर में सैकडों अंडे। बस निफराम। अण्डों से निकले नवजात सुंडी को अंदर ही अंदर से खा पीकर पलते बढ़ते है। यही बच्चे पूर्ण विकसित होकर प्रौढिय रूपांतरण हेतु ककून का निर्माण करते है। वास्तुकला, ज्यामिति व कला का बेजोड़ नमूना होता है यह - ककून। अफ़सोस!आपके मानवसमाज ने हमारे इस हुनर व काम को ठीक उसी तरह नज़र अंदाज किया है जिस तरह से बिटोडों पर अपनी लुगाईयों की महान चित्रकला को।