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Thursday, August 23, 2012

मुद्रो - एक कीटनाशी कीट

प्रौढ़ मुद्रो 

 जारजटिया वंश से तालुक रखने वाला यह कीटभक्षी निडाना के खेतों में सुबह या शाम को फसलों के ऊपर उड़ता दिखाई देता है। दे भी क्यों नही! मुद्रो को उड़ते हुए ही शिकार जो करना पड़ता है। शिकार अपने हाण के या अपने से छोटे कीट का ही आसानी से किया जा सकता हैं। इनके भोजन में भान्त-भान्त की पौधाहारी सुंडियों के प्रौढ़ पतंगे एवं तितलियाँ, भान्त-भान्त के भूंड एवं भँवरे, भुनगे -फुदके आदि कीट शामिल होते हैं। जो फंस गया उसी से पेट भर लिया। मतलब भोजन के मामले में मुद्रो नकचड़ी बिलकुल नही होती। चलताऊ नजर से देखने पर तो मुद्रो के ये प्रौढ़ बने-बनाये लोपा मक्खी जैसे ही दिखाई देते हैं। पर जरा गौर से निंगाहते ही इसके ढूंढ़रूदार लम्बे-लम्बे एंटीने नजर आने लगते हैं। जो लोपा मक्खियों से मेल नहीं खाते। आराम करते हुए इनका बैठने का ढंग भी लोपा मक्खियों से मेल नही खाता। एंटीने व् पंख टहनी के सामांतर तथा शरीर लम्वत- शिकारियों से बचने के लिए लाजवाब छलावरण
                        यह कीट अपने अंडे पौधों की डालियों पर या फिर जमीन पर ड्लियों के निचे रखते हैं। मौसम की अनुकूलता अनुसार अंडों से 5-6 दिन में लारवे निकलते हैं जो अन्य छोटे-छोटे कीटों को खा पीकर ही पलते-बढते हैं। इस कीट के ये लारवे घात लगाकर शिकार करते हैं। अपना पेट भरने के लिए इस कीट के लारवे व् प्रौढ़ों का दूसरे कीटों पर निर्भर रहना ही इन्हें प्राकृतिक कीटनाशी के रूप में अपना वजूद कायम करने के लिए काफी है। मगर इस आपाधापी व् बिसराण के बाजारू युग में किसे फुरसत है विषमुक्त खेती के लिए इनके इस लाजवाब कार्य को परखने व् मान्यता देने की।

Friday, February 10, 2012

सरसों में शाकाहारी कीट- धौलिया

 नाम का धौलिया अर रंग का कालिया यह कीड़ा सरसों की फसल में पाया जाने वाला एक शाकाहारी कीट है। सरसों की फसल के अलावा यह कीट तोरिया, तारामीरा, बंदगोभी, फूलगोभी व् करम कल्ला आदि फसलों में भी पाया जाता है। यह  कीट  बाजरा, ज्वार, मक्की  व् कपास की फसल पर भी गुज़ारा कर लेता है।  इस बुग्ड़े के प्रौढ़ एवं निम्फ, दोनों ही फसल में पत्तों व् कच्ची फलियों से रस चूस कर गुज़ारा करते हैं। पत्तियों से ज्यादा रस निकल जाने पर वे मुरझा कर सुख भी सकती हैं।  फसल की प्रारम्भिक अवस्था में इस कीट का आक्रमण होने पर सरसों की फसल में नुकशान भी हो सकता है। खासकर जब फसल अभी इंच-दो इंच की हो तथा प्रति पौधा कीटों की संख्या 3 -4  पायी जाने लगे। इस समय फसल के पत्तों पर सफ़ेद निशान पड़ जाते हैं। इसीलिए शायद किसान इस बुग्ड़े को धौलिया नाम से पुकारने लगे। अंग्रेज इस कीट को Painted bug कहते हैं। जबकि कीट विज्ञानी इसे Bagrada hilaris नाम से पुकारते हैं। वे बताते हैं की इस बुग्ड़े का नाता Hemiptra वंशक्रम से है तथा इसके कुनबे का नाम Pentatomidae है।
    इस कीट के जीवन काल में तीन अवस्थाये होती हैं: अंडा; निम्फ व् प्रौढ़। प्रौढ़ मादा अपने जीवनकाल में लगभग 90-100 अंडे देती है। देखने में गोल-गोल इन अण्डों का रंग पीला-पीला सा होता है। अंडे एक-एक करके या गुच्छों में दिए जाते हैं। एक गुछे में 5-8 अंडे हो सकते हैं। मादा अपने ये अंडे पत्तों पर, डालियों पर, फलियों पर या भूमि में देती है। गर्मियों में तो इन अण्डों से चार-पांच दिन में निम्फ निकल आते है जबकि सर्दियों में अधिक समय लगता है।
इस बुग्ड़े के ये निम्फ काले रंग के होता है तथा इनके शारीर पर भूरे व् सफ़ेद चकते होते हैं। पूरण विकसित होने पर इनके शारीर की लम्बाई-चौड़ाई 4.0X2.5 मी.मी. होती है। जन्म से लेकर प्रौढ़ के रूप में विकसित होने तक ये निम्फ पांच बार कांजली उतारते हैं।
इस कीट के प्रौढ़ संतरी व् सफ़ेद धब्बों के साथ काले रंग के ही होते हैं। देखने में ढ़ाल जैसे दिखाई देते हैं। मादाएं आकार में नरों के मुकाबले बड़ी होती हैं। हरियाणा में चाहे किसी किसान ने मोरनी-मोर के मधुर-मिलन को देखा या न देखा हो पर इस धौलिया बुग्ड़े के रतिरत जोड़े सभी किसानों ने खूब देख रखे हैं।
    निडाना के किसानों ने इस बुग्ड़े के प्रौढ़ कभी-कभार मकड़ी के जाले में तो उलझे देखे हैं पर इसको खाने वाले कीड़े नही देखे हैं। यह तो प्रकृति में संभव नही कि इस कीट के परभक्षी, परजीव्याभ, परजीवी व् रोगाणु ना हों। पर निडाना के किसानों को इन महानुभावों के दर्शन नहीं हुए हैं। आपको दिखाई दे जाएँ तो जरुर जल्दी से जल्दी सुचना करना।
यह कीट अक्तूबर महीने की शुरुवात में ही दिखाई देने लग जाता है। फसल में इसका ज्यादा प्रकोप अक्तूबर के आखिर में होता है। सरसों की बिजाई अक्तूबर के आखरी सप्ताह में करने से फसल पर इस कीट का प्रकोप कम होता है।




Tuesday, February 7, 2012

साँठी वाली सुंडी

 साँठी वाली सुंडी एक ऐसा कीड़ा है जो कपास की फसल में पाए जाने वाले  साँठी, चौलाई व् कुंदरा आदि खरपतवारों के पत्तों को खा कर अपना गुज़ारा करता है। जिला जींद के निडाना गावं में किसानों ने अनेक अवसरों पर इस कीड़े को अपनी कपास की फसल में साँठी को ख़त्म करते हुए देखा है। खरपतवार का प्राकृतिक नियंत्रण। पर अफ़सोस कि बहुत सारे किसानों को भय बना रहता है कि कहीं यह कीड़ा सांठी को ख़त्म करके उनकी कपास की फसल को नुकशान न करदे। इसीलिए वो साँठी को ख़त्म करने के लिए खरपतवारनाशियों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन निडाना खेत पाठशाला के किसान इस साँठी का सफाया करने के लिए किसी खरपतवारनाशी का इस्तेमाल नही करते। उनके खेतों में तो यह साँठी वाली सुंडी ही यह काम कर देती है। उन्होंने कभी भी इस साँठी वाली सुंडी को कपास के पत्ते खाते नहीं देखा। फिर इससे डर कहे का?
 इस कीड़े को कीट विज्ञानं की भाषा में Spoladea recurvalis कहते हैं। इस कीड़े के कुनबे का नाम Crambidae है। इसका वंशक्रम Lepidoptera है। अंग्रेज इस कीड़े को beet webworm कहते हैं। यह कीड़ा भगवान की तरह सर्वशक्तिमान हो या ना हो पर सर्वव्यापी तो है। दुनिया के तकरीबन देशों में पाया जाता है।
इस कीट के प्रौढ़ का रंग गहरा भूरा होता है तथा इसके पंखों पर सफेद धारियाँ होती है। इसकी शिवासन मादा एक-एक करके या गुच्छों में अंडे देती है। अंडे साँठी के पत्तों की निचली सतह पर दिए जाते हैं। इस कीट की मादा पतंगा अपने 12 -14  दिन के जीवन काल में लगभग 200  अंडे देती है। इन अण्डों से 5 -6  दिन में नवजात सुंडियां निकलती हैं। इन नवजात एवं तरुण सुंडियों की त्वचा पारदर्शी व् रंग हरा होता है। बड़ी होने पर इन सुंडियों का रंग लाल सा हो जाता है। इन सुंडियों को पूर्ण विकसित होने में 20 -22  दिन का समय लगता है। इस दौरान ये 4 -5 बार कांजली उतारती है। ये सुंडियां भूखड़ किस्म की होती हैं।  मुख्य शिरा को छोड़कर पुरे के पुरे पत्ते को खा जाती है। ढांचा भर रहे साँठी के पौधे अंतत: सुखकर मर जाते है।
                                         हमारी फसलों में इस सुंडी का उपभोग करने के लिए Cotesia plutellae नामक ब्रेकोन सम्भीरका बहुतायत में होती हैं। ट्राईकोग्रामा नामक सम्भीरका अपने बच्चे इस कीड़े के अण्डों में पालती है। इस कीट के प्रौढ़ों को उड़ते हुए ही लोपा मक्खियाँ पकड़ लेती हैं व् चट कर जाती हैं। डायन मक्खियाँ इस कीट के प्रौढ़ पतंगों का शिकार दिन-धौली करती हैं। दीदड़ बुग्ड़े, फलैरी बुग्ड़े, कातिल बुग्ड़ेसिंगु बुग्ड़े इस कीट के अंडों से जूस व् सुंडियों से खून पीने की ताक में रहते हैं। निडाना के किसानों ने इस कीट के प्रौढ़ पतंगों को मकड़ियों द्वारा लपेटते व् खाए जाते देखा है। मुंद्रो व् सुंद्रो नामक जारजटिया समूह के कीट भी इस कीट को भोजन के रूप में इस्तेमाल करते हैं। प्रकृति में इतना गज़ब का संतुलन होने के बावजूद भय एवं भ्रम के शिकार किसान इस कीट को काबू करने के लिये पीठ पर कीटनाशी पिठू लादे मिल जायेंगे। ऐसे समझदार किसानों का तो राम बरगा यू कीटनाशी बाज़ार ही रुखाला हो सकता है!

Sunday, January 22, 2012

कुम्हारी-एक कीटनाशी ततैया

 "पतली कमर पर ढुंगे पै चोटी कोन्या !!
सै कुम्हारी पर कुम्हारों आली कोन्या !!"

असल में यह तो भीरड़-ततैयों वाले कुनबे की सै। अपना जापा काढण ताहि यह ततैया चिकनी मिटटी से छोटे-छोटे मटकों का निर्माण करती है। इसीलिए किसानों ने इसका नाम कुम्हारी रख लिया। वैसे तो इस ततैया की दुनिया भर में सैकड़ों प्रजातीय पाई जाती होंगी पर निडाना की कपास व् धान की फसल में तो अभी तक किसानों ने यही एक प्रजाति देखी है। यह कीट एकांकी जीवन जीने का आदि है मतलब समूह की बजाय अकेले-अकेले रहना पसंद करता है। काली, पीली व् गुलाबी छटाओं वाली इस ततैया की शारीरिक लम्बाई तकरीबन 15 -17  मी.मी. होती है। यह सही है कि इस कीट के प्रौढ़ तो फूलों से मधुरस पीकर अपना गुजर-बसर करते हैं पर इनके शिशुओं को अपनी शारीरिक वृद्धि के लिए बिना बालों वाली सुंडियां चाहिए। इसीलिए तो आशामेद होते ही इस कीट की मादा अंडे देने के लिए चिकनी मिटटी के छोटे-छोटे मटकों का निर्माण शुरू करती है। मटकों के लिए घरों से बाहर ऐसी जगह का चुनाव करती है जहाँ ये मटके सूरज के ताप, वायु के वेग और वर्षा की आल से सुरक्षित रह सके। चिकनी मिटटी तलाश कर, उसकी छोटी-छोटी गोलियां बनाती है तथा उन्हें अपने मुहँ और अगली टांगों की सहायता से निर्माण स्थल तक लाती है। इस मादा को एक फेरा पूरा करने में पांच मिनट तथा एक मटका घड़ने में लगभग आधा दिन लग जाता है। इस कपास के पत्ते पर मिटटी तो तीन मटकों के लिए ढ़ो राखी थी पर निर्माण एक का ही कर पाई थी कि फोटों खीचने वालों ने तंग कर दी। मटके घड़ने का काम पूरा करके खेतों में निकलती है यह मादा ततैया। वहां रोयें रहित सुंडियां तलाशती है। एक सुंडी ढूंढने में घंटा लग जाता है। सुंडी मिलते ही अपने डंक द्वारा जहर छोड़ कर उस सुंडी को लुंज कर देती है और उसे मटके में ला पटकती है। प्रत्येक मटके में सात-आठ से दस- बारह सुंडी रखती है। फिर हरेक मटके में अपना एक अंडा रखती है। इसके शिशु इन भंडारित सुंडियों को ही खा-पीकर विकसित होते है। मटके में ही प्युपेसन अवस्था पूरी करते हैं। मटके में अंड-निक्षेपण के बाद यह मादाएं मटके के मुहँ को बंद करना नही भूलती। आवासीय निर्माण के दौरान और बाद में भी ये ततैया मटकों के पास विश्राम नहीं करती। इस ततैया के नर मधुर-मिलन के अलावा दूर से ही सही, इन मटकों क़ी चौकीदारी तो करते हैं।
हमारी फसलों में सुंडियों के नियंत्रण के लिए बड़े काम क़ी हैं ये कुम्हारी। जिस तरह से कुम्हारों ने इस कीट से मटके बनाना सीखा ठीक उसी तरह से किसानों को इस कीट से कीट नियंत्रण के पहाड़े सिखने आवश्यकता है। और हमेँ किसानों के लिए व्यापक पैमाने पर कीट साक्षरता अभियान चलाने क़ी।

Sunday, August 28, 2011

बांसिया बुग्ड़ा

 बांसिया बुग्ड़ा कपास की फसल में पाया गया एक छोटा सा कीड़ा है. छरहरे बदन के इस कीड़े की टांगें अत्याधिक लम्बी व् धागेनुमा होती है. इस कीड़े के एंटीना भी बहुत लम्बे होते हैं. इतनी लम्बी टांगों व् एंटीना के बावजूद इस कीड़े के शरीर की लम्बाई बामुश्किल सात से दस मि.मी. ही होती है. Lygaeidae कुटुंब की Jalysus जाती के इस बुग्ड़े की कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं. कुछ प्रजातियाँ तो शाकाहारी होती हैं और कुछ प्रजातियाँ आंशिक तौर पर परभक्षी होती हैं. शाकाहारी बुग्ड़े कपास, मक्की, टमाटर, तम्बाकू व् घिया-तोरी आदि के पौधों की पत्तियों की निचली सतह से रस चौसन कर गुज़ारा करती हैं.

     इस कीट द्वारा फसलों में हानि पहुचाने की कोई शिकायत ना तो कभी किसी किसान ने और ना ही किसी कीट-विज्ञानी ने कहीं दर्ज करवाई है. शायद इसीलिए इस कीट की गिनती कपास के मेजर या मायनर कीटों में होना तो दूर की कौड़ी. कीट विज्ञानिक तो कपास की फसल में हानि पहुँचाने कीटों में इस बांसिया बुग्ड़े का जिक्र करना भी मुनासिब नही समझते. करें भी कैसे जब ये बांसिया बुग्ड़े अपने वजूद का अहसास ही नही करा पाते. लेकिन हकीकत यह भी है कि रूपगढ, राजपुरा, इग्राह, निडाना, निडानी, ललित खेडा, भैरों खेडा व् बराह कलां की खेत पाठशालाओं में कपास की फसल में इस कीट को देख चुके हैं.
    

Friday, August 5, 2011

तम्बाकूआ-सुंडी

प्रौढ़ पतंगा 
सुंडी 
तम्बाकूआ-सुंडी सामनी के समय म्हारे हरियाणा में कपास के साथ-साथ अरहर व् डैंचा के पौधों पर दिखाई देने वाला एक पर्ण-भक्षी कीड़ा है।  इस सुंडी को कीट-वैज्ञानिक Spodoptera litura कहते-लिखते हैं। अंग्रेज इसे टोबैको केटरपिलर के नाम से पुकारते हैं. इसके परिवार को Noctuidae व् वंश-क्रम को Lepidoptera कहा जाता है। इस कीड़े का आगमन कपास की फसल में कमोबेस प्राय हर साल ही देखने में आता है। फसल में पत्तों को खा लेना भी नुकशान है तो यह काम इस कीड़े की सुंडियां ही करती हैं। शुरुवाती काल में ये सुंडियां झुण्ड में रहकर पत्ती की निचली सतह खुरच कर खाती हैं। परिणामस्वरूप पत्तियों का ढांचा भर रह जाता है। बाद में ये सुंडियां तितर-बितर हो जाती हैं और रात में अकेली घुमने लगती हैं। अब ये पत्तों के अलावा कलियों, फूलों, पंखुड़ियों को भी खा जाती हैं। ये सुंडियां खा-पीकर 3.5 से 4.0 सै.मी. तक लम्बी हो जाती हैं। इनका शरीर मखमली काला होता है जिसकी पीठ पर पीली-हरी धारियाँ होती हैं व् अगल-बगल में सफेद बैंड होते हैं। इस कीड़े के ये भूरे-सुनैहरी प्रौढ़ बड़े सुन्दर दिखाई देते हैं। प्रौढ़ पतंगे की लम्बाई 22 मि.मी. व् इसके पंखों का फैलाव तक़रीबन 40 मी.मी. होता है। इस कीड़े की प्रौढ़ मादाएं अपने जीवन काल में 1000 -1200 अंडे देती हैं। ये अंडे पत्तियों की निचली सतह पर किनारों के पास गुच्छों में दिए जाते हैं। प्रत्येक गुछे में 70 -100 अंडे होते हैं। अण्डों के ये गुछे पीले रंग की गंदगी और रोओं से ढके रहते हैं।  इन अण्डों से 4-5 दिन में इस कीट की सुंडियां निकलती हैं। ये सुंडियां छ: अंतर्रुपों से गुजरते हुए प्युपेसन में जाने तक लगभग 15 से 30 दिन का समय ले लेती हैं। इस कीट की प्यूपल अवस्था जमीन के अन्दर 10 -12 दिन में पूरी होती है। इस पतंगे का प्रौढीय जीवन सात-आठ दिन का होता है। कपास के साथ-साथ तम्बाकू, अरंड, चना, मिर्च, बंदगोभी, फूलगोभी , मूंगफली. अरहर व् दैंचा आदि के पौधों पर भी बखूबी फलती-फूलती पाई जाती है, ये तम्बाकूआ-सुंडी। 
भक्षण
इस कीड़े की विभिन्न अवस्थाओं के सहारे अपना जीवन निर्वाह करने वाले दुनिया भर के मांसाहारी कीट भी हरियाणा के कपास परितंत्र में मिल जायेंगे। निडाना के किसानों ने अपने कपास के खेतों में कई किस्म की लेडी बीटल देखली जो इस कीट के अंडे व् तरुण सुंडियां खाकर जीवन की गाड़ी को आगे बढाती हैं। इन्होने इनके अण्डों व् सुंडियों का जीवन रस पीते हुए कातिल बुग्ड़े, सिंगू बुग्ड़े तथा इनके बच्चे देख लिए। इस कीट के प्रौढ़ पतंगों का उड़ते हुए शिकार करती लोपा-मक्खी व् डायन-मक्खी मौके पर देख चुके हैं। ये किसान. इस तम्बाकूआ-सुंडी को परजीव्याभित करते ब्रेकन सम्भीरका व् इसके कोकून देख चुके हैं। इन कोकुनो से कोटेसिया को बाहर निकलते भी निडाना के किसान अपनी आँखों से देख चुके हैं। इन तम्बाकूआ-सुंडियों का भक्षण करते हुए नौ किस्म के हथजोड़े(Praying mantis) भी किसान देख चुके हैं। जब किसानों ने एक हथजोड़े के साथ तीन तम्बाकूआ-सुंडियों को शीशी में रोक दिया तो इन तीन पर्णभक्षी सुंडियों ने मिल कर इस मांसाहारी कीट हथजोड़े को खा लिया. शायद अपनी जान बचाने के लिए।
कपास के खेतों में मकड़ियां भी इस कीट को खाते हुए किसानों ने देखी हैं।
किसानों का कहना है कि जब हमारे खेतों में कीट नियंत्रण के लिए कीटनाशकों के रूप में इतने सारे कीट प्राकृतिक तौर पर पाए जाते हैं तो हमें बाज़ार से खरीद कर कीटनाशकों के इस्तेमाल की आवश्यकता कहाँ है?
       अब एक सवाल आपसे? जवाब चाहिये।
                         यह पर्णभक्षी कीड़ा हमारे यहाँ कपास की फसल में सितम्बर व् अक्तूबर के महीनों में क्यों आता है जबकि इसके खाने लायक पत्ते तो कपास की फसल में शुरुआत से ही होते हैं।





Thursday, August 4, 2011

कपास में चुरड़ा -एक शाकाहारी कीट!




अंग्रेजों द्वारा थ्रिप्स कहा जाने वाला यह चुरड़ा कपास की फसल में पाया जाने वाला एक छोटा सा रस चुसक कीट है. कीट- वैज्ञानिक इसे Thrips tabaci के नाम से पुकारते हैं. बनावट में चरखे के ताकू जैसा यह कीट पीले-भूरे रंग का होता है. इस कीट की मादा अपने प्रजनन-कल में 4-6 प्रतिदिन के हिसाब से 50-60 अंडे देती है. इन अण्डों की बनावट इंसानी गुर्दों जैसी होती है. इन अण्डों से ताप व् आब के मुताबिक तीन से आठ दिनों में शिशु निकलते हैं. इनका यह शिशुकाल सात-आठ दिनों का होता है तथा प्युपलकाल दो से चार दिन का. इस कीट के निम्फ व् प्रौढ़ पत्तियों की निचली सतह पर नसों के आस-पास पाए जाते हैं. इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ कपास के पौधों के पत्तों की निचली सतह को नसों के आस-पास खुरच कर रस पीते हैं. परिणामस्वरूप पत्तियों की निचली सतह चांदी के समान चमकने लगती है तथा उपरवाली सतह बादामी रंग की हो जाती है. ज्यादा प्रकोप होने पर पत्तियां ऊपर की तरफ मुड़ने लगती हैं. अंत में ये प्रकोपित पत्तियां सुख कर गिर भी जाती हैं.
            यह कीड़ा कपास की फसल के अलावा प्याज़, लहसुन व् तम्बाकू आदि फसलों पर भी अपना जीवन निर्वाह व् वंश वृद्धि करता है. पर कपास की फसल में चुरड़ा अंकुरण से लेकर चुगाई तक बना रहता है. वो अलग बात है कि इस कीट की संख्या आर्थिक हानि पहुचाने के स्तर यानिकि दस निम्फ प्रति पत्ता पर कभी-कभार ही पहुँचती है. इस का मुख्य कारण कि इस कीट को खाने वाले कीड़े भी कपास कि फसल में लगातार बने रहते हैं. परभक्षी-मकड़िया जूं, छ: बिन्दुवा-चुरड़ा, दिद्दड़-बुग्ड़ा व् एन्थू-बुग्ड़ा इस चुरड़े का खून चूस कर गुज़ारा करने वालों में प्रमुख हैं. भान्त-भान्त की लेडी बीटल व् इनके बच्चे भी इस चुरड़े को खा कर अपना पेट पालते हुए कपास के खेत में पाए जाते हैं।
जिला जींद में किसानों द्वारा कपास में नलाई-गुड़ाई होने पर या तापमान में गिरावट होने पर इस कीट की संख्या में घटौतरी दर्ज की गयी है.

Friday, August 6, 2010

छैल-मक्खी - एक परभक्षिया कीटनाशी

छैल मक्खी अन्य छैल को खाते हिए।
आराम फरमाती छैल मक्खी
 छैल-मक्खी (Damsel fly) चौमासे (आमतौर पर जून, जुलाई और अगस्त) के दौरान विभिन्न फसलों में उड़ते हुए नजर आने वाली एक महत्वपूर्ण कीटखोर मक्खी है। हरियाणा में इसे तुलसा के नाम से जाना जाता है। लंबे, संकरे व पारदर्शी पंखों वाली ये मक्खियाँ कई रंगों में पाई जाती हैं। इन्हें लोपा-मक्खियों (Dragon flies) के मुकाबले कमजोर उड़ाकू माना जाता है। उड़ने की प्रतियोगिता में उपरोक्त कीटों की हार-जीत से किसानों का क्या लेना-देना। किसानों के लिये तो यह जानकारी फायदेमंद है कि इस छैल-मक्खी के प्रौढ़ व अर्भक, दोनों ही मांसाहारी होते है। यह मक्खी अपने अंडे खड़े पानी में देती है। पानी चाहे गावं के जोहड़ या जोहड़ी में हो या फिर धान के खेत में हो। इस कीड़े के अर्भक पानी में पाये जाने वाले मच्छर के लार्वा समेत उन अन्य सभी कीटों का शिकार कर लेते हैं जो आकार में इनके बराबर या छोटे हों। धान की फसल को हानि पहूँचाने वाले विभिन्न फुदकों का शिकार करने में इन्हें बहुत आनंद आता है। वैसे तो इस कीट के अर्भक पानी में रहते हैं लेकिन खाने के लिए अन्य कीड़ों की तलाश में धान के पौधों पर चढ़ने में इन्हें गुरेज नही होता। इस मक्खी की कुछ प्रजातियाँ तो मकड़ियों को भी खा जाती हैं, मकड़ी के जाले के पास मँडराते- मँडराते ही जाले में से मकड़ी को दबोच लेती हैं। भोजन के लिये अन्य कीड़ों का अभाव होने पर यह मक्खियाँ आपस में ही एक दूसरे को खा जाती हैं। शायद भोजन में इतनी विविधता के कारण ही भोजन श्रृंखला में इन्हे उच्चा दर्जा हासिल है।
आराम फरमाती छैल मक्खी।
रति रत जोड़े।
आराम

Wednesday, July 29, 2009

प्राकृतिक कीटनाशी - डायन मक्खी

टिड्डे का शिकार करती डायन मक्खी।
जिला जींद के फसलतंत्र में किसान मित्र के रूप में डायन मक्खी भी पाई जाती हैं. जी, हाँ! , राजपुरा ईगराह रूपगढ, निडाना व ललित खेडा के किसान तो इसे इसी नाम से जानते हैं जबकि अंग्रेज इसे Robber Fly कहते हैं. नामकरण की द्विपदी प्रणाली के अनुसार यह डायन मक्खी, Dipterans के Asilidae परिवार की Machimus प्रजाति है.
डायन मक्खी घोर अवसरवादी एवं प्रभावशाली परभक्षी होती है. डायन मक्खी के ये गुण इसके शारीरक ढांचे में निहित होते हैं. इन मक्खियों की टांगें काफी मजबूत होती हैं. ऊपर से इन पर कसुते कांटे होते हैं. इनके माथे पर दो जटिल एवं विशाल आँखों के मध्य खास खड्डे में तीन सरल आँखें भी होती हैं. अपनी इन आँखों व् टांगों के कारण ही ये मक्खियाँ शिकार का कोई अवसर हाथ से नही जाने देती. इनके चेहरे पर कसुते करड़े बालों वाली मुच्छ होती हैं जो मुठभेड़ के समय इनके बचाव के काम आती हैं.
टिड्डे को बेहोश करती डायन मक्खी।
 शिकार फांसने के लिए लुटेरों जैसी रणनीति के कारण ही शायद इन्हें डायन या डाकू मक्खी कहा जाने लगा. डायन  मक्खी अपने अड्डे से शिकार करती हैं. ये  मक्खी अपना अड्डा खुली एवं धुप वाली जगह बनाती हैं. अड्डे की जगह पौधों की टहनी, ठूंठ,  पत्थर व ढेला आदि कुछ भी हो सकती है. इस मचान पर बैठ कर ही यह मक्खी अपने शिकार का इंतजार करती रहती है. यहाँ से गुजरने वाले शिकार पर झपटा मरने के लिए इस मचान से उड़ान भरती हैं. कीट वैज्ञानिकों का कहना हैं कि यह डायन मक्खी अपनी टोकरिनुमा कांटेदार टांगों से ही उड़ते हुए कीटों को काबू करती हैं. हमने तो इस मक्खी को कई बार जमीन पर बैठे - बिठाए टिड्डों को भी झपटा मार कर अपनी गिरफ्त में लेते हुए देखा है.
टिड्डे का खून पिते हुए डायन मक्खी।
शिकार को पकड़ते ही, डायन अपना डंक उसके शरीर में घोपती है व इस डंक के जरिये ही वह शिकारी के शरीर में अपनी लार छोड़ती है. इस लार में एक तो ऐसा जहरीला प्रोटीन होता है जो तुंरत कारवाई करते हुए शिकार  के स्नायु- तंत्र को सुन्न करता है तथा दूसरा एक ऐसा पाचक प्रोटीन होता है जो शिकार के शरीर के अंदरूनी हिस्सों को अपने अंदर घोल लेता है. इन घुले हुए हिस्सों को डायन मक्खी ठीक उसी तरह से पी जाती हैं जैसे कोई बड़ा - बुड्डा दूध में दलिया घोल कर पी जाता है.
इनके भोजन में मक्खी, टिड्डे, भुंड, भिरड, बीटल, बग़, पतंगे व तितली आदि कीट शामिल होते हैं. डायन मक्खी कई बार अपने से बड़े जन्नोर का शिकार भी कुशलता से कर लेती हैं.


Sunday, July 26, 2009

कपास में शाकाहारी कीट - तेला

तेले का प्रौढ़
अमेरिकन कपास में पत्तों से रस चूस कर गुज़ारा करने वाले मुख्य कीटों में से एक है यह तेला। यह तोतिया रंग का होता है जिसे हरियाणा में हरे तेले के रूप में जाना जाता है।अंग्रेज इसे jassid कहते है। जीव-जंतुओं के नामकरण की द्विपदी प्रणाली के मुताबिक यह कीट Cicadellidae कुल के Amrasca biguttula के रूप में नामित है।
लोहार की छेनी जैसा दिखाई देना वाला यह कीट लगभग तीन मिलीमीटर लंबा होता है। इसकी चाल रोडवेज की लाइनआउट खटारा बस जैसी होती है। स्वभावगत यह कीट लाइट पर लट्टू होने वाले कीटों में शुमार होता है।
तेला के प्रौढ़ एवं निम्फ, दोनों ही पौधों के पत्तों से रस चूस कर अपना गुज़ारा करते है। ये महानुभाव तो रस चूसने की प्रक्रिया में पत्तों में जहर भी छोड़ते हैं। रस चूसने के कारण प्रकोपित पत्ते पीले पड़ जाते हैं तथा उन पर लाल रंग के बिन्दिनुमा महीन निशान पड़ जाते हैं। ज्यादा प्रकोप होने पर पुरा पत्ता ही लाल हो जाता है तथा निचे की ओर मुड़ जाता है। अंत में पत्ता सुख कर निचे गिर जाता है।
तेले के निम्फ

तेले की सिवासन मादा अपने जीवन काल में तकरीबन 30-35 अंडे पत्तों की निचली सतह पर मध्यशिरा या मोटी नसों के साथ तंतुओं के अंदर देती है। 5-6 दिनों में विस्फोट हो,  इन अण्डों में से तेला के निम्फ निकल आते हैं। निम्फ पत्तों की निचली सतह से रस चूस कर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। मौसम की अनुकूलता व भोजन की उपलब्धता के अनुसार, तेले के ये निम्फ प्रौढ़ के रूप में विकसित होने के लिए 10-20 दिन का समय लेते हैं।
तेले की कांझली
इस दौरान ये निम्फ तकरीबन 5 बार कांजली उतारते हैं। निम्फ से आगे का इनका यह प्रौढिय जीवन लगभग 40-50 दिन का होता है।
इस प्रकृति में खाने और खाए जाने की प्रक्रिया से तेले भी अछूते नहीं हैं। तेलों के निम्फ़ व प्रौढ़ कपास की फसल में पन्द्राह किस्म की  मकडियों, तीन किस्म की  कमसीन मक्खियों, तीन किस्म के  कराइसोपा व चौदाह किस्म की लेडी बीटल आदि जीव-जन्नौरों का कोप भाजन बनते हैं। दस्यु बुगडे़ के प्रौढ़ एवं निम्फ, दीद्ड़ बुगडे़  के प्रौढ़ एवं निम्फ,, कातिल बुगडे़ के निम्फ  व कंधेडू़ बुगडे़ के निम्फ इस कीट के खून के प्यासे होते हैं।

तेले का नुक्शान
तेले का शिकार करती लाल कुटकी
इस तेले के शिशुओं का खून चुसते हुए भैरों खेड़ा गावं के खेतों में कपास की फसल पर परभक्षी कुटकियाँ भी किसानों ने अपनी आँखों से देखी हैं। बामुश्किल आधा मिली मीटर लम्बी ये कुटकियाँ सुर्ख लाल रंग की थी।
इस तेले के अंडो में अंडे देने वाले भांत-भांत के परअंडिये भी भारत की फसलों में पाये जाते हैं। इनमे से  Arescon enocki नामक परअंडिया तो कारगर भी कसुता बताया गया।
                   तेले के प्रकोप से बचने के लिये पौधे स्वयं इन परभक्षियों, परजीव्याभों एवं परजीवियों को तरह-तरह की गंध हवा में छोड़ कर अपने पास बुलाते हैं। अदभुत तरीके हैं पौधों के पास अपनी सुरक्षा के।
किसानों को बस जरूरत है तो  अपनी स्थानीय पारिस्थितिकी को समग्र दृष्टि से समझने की। बाकि काम तो कीट एवं पौधे मिलकर निपटा लेंगे। 

Saturday, July 18, 2009

प्राकृतिक कीटनाशी - कातिल बुगडा



" बुड्डा हो या जवान, हत्या सेती काम। " जी, हाँ! यही काम है इस सुधे एवं शांत से दिखाई देने वाले कीट का। निडाना, रूपगढ़, राजपुरा व ईगराह के किसान इसे कातिल बुगडा कहते हैं। यूरोपियन लोग इसे असैसिन बग कहते हैं। जीव विज्ञान की जन्मपत्री के मुताबिक इन बुगड़ों की प्रजातियों का नाम मालूम नहीं पर इनका वंशक्रम Hemiptera व् कुणबा Reduviidae जरुर सै। जिला जींद के निडाना गाम में किसान अपनी फसलों में अब तक इन कातिल बुगड़ों की तीन प्रजातियाँ देख चुके हैं। अपने से छोटे या हाण-दमाण के कीटों का कत्ल कर उनके खून से अपना पेट पालना व वंश चलाना ही इसका मुख्य धंधा है। इनके भोजन में गजब की विविधता होती है। इनके भोजन में मच्छरों, मक्खियों, मिलिबगों, तितलियों, पतंगों, बुगड़ों, भृगों तथा भंवरों सम्मेत अनेक किस्म के कीट व उनके शिशु शामिल होते है। कातिल बुगड़े व इनके बच्चे विभिन्न कीटों के अण्डों का जूस भी बड़े चाव से पीते हैं। ये बुगड़े हालाँकि उड़ने में हरकती होते हैं पर शिकार फंसते ही उसके शरीर में अपना डंक घोपने में एक सैकंड का समय नही लगाते। ये कातिल कीट डंक के जरिये शिकार के शरीर में अपना जहर छोड़ते हैं। इस जहर में शिकार के शरीर के अन्दरूनी हिस्सें घुल जाते हैं जिन्हें ये डंक की सहायता से चरड-चरड पी जाते हैं। मादाओं को प्रजनन का काम भी करना होता है। इसके लिए उन्हें सैंकडों की तादाद में अंडे देने होते हैं। इसीलिए तो मादाओं को नरों के मुकाबले ज्यादा प्रोटीनों की आवश्यकता बनी रहती है। प्रोटीनयुक्त ज्यादा भोजन कुशल शिकारी बनकर ही जुटाया जा सकता है। इसीलिए तो नरों के मुकाबले  इन बुगड़ो की मादा अधिक कुशल शिकारी होती हैं। शिकार ना मिलने की हालत में इनके भूखा मरने की नौबत भी आ जाती है। ऐसे हालत में ये एक दुसरे का कल्याण भी कर डालते हैं।

पकड़ने की कोशिश करने या इनके साथ छेड़खानी करने पर ये बुगडे इंसानों को भी डंक मारने से नही चुकते। इनके काटने से होने वाली असहनीय पीडा का सही अंदाजा तो इनका डंक मरवा कर ही लगाया जा सकता है। इंसानों में "चागा" नामक लाइलाज बीमारी फैलाने में इन कातिल बुगडो की बहुत बड़ी भूमिका होती है। अत: किसानों को इनका तमासा दूर से ही देखना चाहिए।


खानदानी परिचय :
कातिल बुगडों का मुहं बेशक बटवा सा न होता हो पर इनका डंक जरुर सुआ सा होता है। इनके शरीर का रंग काला व लाल या काला व भूरा होता है तथा शरीर की लम्बाई बीस-पच्चीस मिलीमीटर होती है। इनका गर्दन रूपी सिर काफी लंबा व पतला होता है। इनकी चमकदार आँखें माला के मनकों जैसी गोल -गोल व छोटी-छोटी होती हैं।
इनके शिशु जिन्हें कीट वैज्ञानी निम्फ कहते हैं, पंखों को छोड़कर अपने प्रौढों जैसे ही होते हैं। मौसम के मिजाज व भोजन की उपलब्धता के मुताबिक कातिल बुगडा के ये शिशु पैदा होने से लेकर प्रौढ़ बनने तक 65 से 95 दिन का समय लेते हैं और इस दौरान ये पॉँच बार कांझली उतारते हैं। इनका प्रौढिय जीवन 6 से 10 महीने तक का होता है। इस दौरान आशामेद होने के बाद, सिवासन मादाएं आमतौर पर समूहों में अंडे देती हैं।  एक समूह में तकरीबन चालीस से पच्चास अंडे होते है जिनका रंग गहरा भूरा होता है। इन अण्डों की बनावट सिगार जैसी होती है।





कातिल बुगड़े का अंडा.
कातिल बुगड़े का निम्फ












Monday, March 23, 2009

कपास सेधक कीट मिलीबगः संक्षिप्त परिचय

सिवासण मिलीबग
कपास पर मिलीबग
टमाटर पर मिलीबग
धतूरे पर मिलीबग


हिन्दुस्तान में अंग्रेजी के अखबार दि ट्रिब्यून के संपादक की 24 नवंबर,2001 को अंग्रेजी में डांट खा कर, अमेरिकन सूंडी ने यहाँ अब तक दोबारा गर्दन उठाने की हिमाकत नही की है। पर बी.टी. बीजों के प्रचलन के साथ ही हमारी कपास की फसल में एक नया हानिकारक कीड़ा नजर आने लगा। 2007 में इस कीट की गिनती कपास के प्रमुख सेधक कीटों में होने लगी। कीट वैज्ञानिकों ने इसकी पहचान फिनोकोकस सोलेनोप्सिस नामक मिलीबग के रुप में की। किसान इसे मिलीबग, मिलीभगत, फुही आदि नामों से पुकारने लगे। कपास की खेती में अचानक आई इस नई मुसिबत को मिडिया कर्मियों ने "कपास का भस्मासुर" नाम दे दिया। सोलेनोप्सिस नामक यह मिलीबग मूलतः अमेरिका का निवासी है। अमेरिका में ही सबसे पहले इस कीड़े को सन् 1897 में टिंस्ले ने सजावटी पौधों पर देखा था। कपास की फसल में भी इस कीट को पहली बार 1990 में अमेरिका में ही देखा गया। फ्यूच व उसके मित्रों ने इस तथ्य की पुष्टि की थी। अब तो अर्जेंटिना, ब्राजील, घाना, नाइजीरिया, इस्राइल, पाकिस्तान, भारत, इन्डोनेशिया, थाइलैंड व चीन आदि देशों में कपास की फसल पर आक्रमण करते हुए यह मिलीबग आम पाया जाता है।
कपास का यह भस्मासुर एक बहुभक्षी कीट है। हरियाणा में किसानों ने इस मिलीबग को कपास के अलावा कांग्रेस-घास, चौलाई, साँठी, कचरी, भम्भोले, अक्संड, कंघी-बुटी, आवारा-सूरजमुखी, उल्ट-कांड, बाजरी, धतूरा, भूमि-आंवला आदि गैरफसली पौधों पर फलते-फूलते हुए देखा है। भिंडी, बैंगन, टमाटर आदि सब्जियों की फसल पर इस कीट का प्रकोप यहाँ आम बात हो गई है। चाईना-रोज जैसे सजावटी पौधे पर यह कीट देखा गया है| हिंस, नीम पीपल जैसे दरखतों पर भी जींद शहर में इस कीट को देखा गया है। पाकिस्तान में तो पौधों की 154 प्रजातियों पर इस रस चूसक कीट की उपस्थिति दर्ज की गई है। 

पहचान और जीवनचक्रः
सिवासण मिलीबग।

मादाः इस मिलीबग की मादाएं पंखहीन होती हैं। इनका अंडाकार शरीर 3-4 मि.मी. लंबा होता है। मादा मिलीबग का यह शरीर सफेद रंग के मोम्मियाँ पाऊडर से ढ़का रहता है। मादा मिलीबग के शरीर पर यह पाऊडर जल विकर्षक का काम करता है। इस मादा मिलीबग की धड़ और पेट पर काले धब्बे होते हैं जो गहरी अनुदैर्ध्य (longitudinal) लाइनों के रूप में दिखाई देते हैं। सिवासण मादा मोम्मिया अंडेदानी में 150 से 600 तक अंडे देती हैं। मादा इस अंडेदानी को अपनी छाती के निचे छुपा कर रखती है। 3 से 9 दिनों में इन अंडों से निम्फ निकलते हैं। मिलीबग के ये निम्फ बहुत चंचल व सक्रिय होते हैं तथा इन्हें क्रॉलर के नाम से जाना जाता है। मिलीबग की यह निम्फल अवस्था बीस-बाईस दिन की होती है|

गाभरु मिलीबग।
मधुर मिलन

नरः इस मिलीबग के बालिग नर 1 मि.मी. लंबे होते हैं। इनका शरीर भूरे रंग का होता है। इनके एक जोड़ी पारदर्शी पंख होते हैं। इनके पेट के अंत से सफेद मोम के दो तन्तु से निकले रहते हैं जो उड़ान के दौरान संतुलन साधने में सहायक होते हैँ। अविकसित मुखांग होने के कारण ये बालिग नर कुछ खा-पी नही सकते। इन नरों की उमर बामुश्किल दो-ढ़ाई दिन की ही होती है। इस दौरान मादाओं के साथ सहवास करने के अलावा इनके पास कोई काम नही होता।







Saturday, February 21, 2009

कपास का भस्मासुर -मिलीबग

बी टी बीजों के प्रचलन के साथ ही कपास की फसल में एक नए कीड़े के प्रकोप की शुरुआत हुई है । इस कीट का नाम मिलीबग है । लोग इसे मिलीभगत,फुही व भस्मासुर आदि नामों से भी पुकारते हैं । देश के साथ साथ अपने हरियाणा में भी अभी से इस कीट को कपास की फसल के लिए एक बडे खतरे के रूप में देखा जाने लगा है । लेकिन यह कीट अपनी तीन कमजोरियों; " मादा का पंखविहीन होना, कीट का बहुभक्षी होना व थैली में अंडे देना । " के कारण अपने शत्रुओं का आसानी से शिकार बनता है। जिला जींद की कपास परिस्थितिक्तंत्र में इस कीट के शत्रुओं के रूप में एक परजीवी, तीन परजीव्याभ, तीस परभक्षी व तीन रोगाणु पाए गए हैं। राजपुरा,रूपगढ व निडाना के किसानों ने स्वयं अपनी आँखों से मिलीबग के इन शत्रुओं को कपास के पौधों व गैरफसली पौधों पर देखा है। इसका मतलब है अपने यहाँ एक मजबुत प्राकृतिक संतुलन का होना। इन्ही कीटों में से एक दीदड़ बुगडा मिलीबग का खून चूसते हुए इस विडियो में निडाना के किसानों ने मौके पर कैद किया है।