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Sunday, December 27, 2009

प्राकृतिक कीटनाशी - अंगीरा !

2005 की साल हरियाणा प्रान्त में अमेरिकन कपास की साधारण किस्मों की जगह बी.टी. हाइब्रिडों का प्रचलन हुआ। इसके साथ ही कपास की फसल में फिनोकोक्स सोलेनोप्सिस नाम का मिलीबग भस्मासुर बन कर सामने आया और देखते-देखते ही कांग्रेस घास के पौधों पर भी छा गया। संयोग देखिये, अमेरिकन कपास, कांग्रेस घास व मिलीबग का निकासी स्थल एक ही है। हिंदुस्तान में आते ही मिलीबग को कांग्रेस घास के रूप में पूर्व परिचित, एक सशक्त वैकल्पिक आश्रयदाता मिल गया। कांग्रेस घास पर मिलीबग का किसानों के घातक कीटनाशकों से पुरा बचाव व सारे साल अपने व बच्चों के लिए भोजन का पुरा जुगाड़। पर प्रकृति की प्रक्रियाएं इतनी सीधी व सरल नही होती। बल्कि इनमेँ तो हर जगह हर पल द्वंद्व रहता है। प्रकृति में सुस्थापित भोजन श्रृंख्ला की कोई भी कड़ी इतनी कमजोर नही होतीं कि जी चाहे वही तोड़ दे। फ़िर इस मिलीबग की तो बिसात ही क्या? जिसकी मादा पंखविहीन हो तथा अन्डे थैली में देती हो। जिला जींद की परिस्थितियों में ही सात किस्म की लेडी बिटलों, पांच किस्म की मकडियों व पांच किस्म के बुगडों आदि परभक्षियों तथा तीन किस्म के फफुन्दीय रोगाणुओं के अलावा तीन किस्म की परजीवी सम्भीरकाओं ने मिलीबग को कांग्रेस घास पर ढूंढ़ निकाला। यहाँ की स्थानीय परिस्थितियों में मिलीबग को परजीव्याभीत करने वाली अंगीरा, जंगीरा व फंगीरा नामक तीन सम्भीरकाएं पाई गई है। इनमें से मिलिबग  के साथ विदेश से आई अंगीरा(Aenasius bambawalei Hayat) ने तो कांग्रेस घास के एक पौधे पर मिलीबग की पुरी आबादी को ही परजीव्याभीत कर दिया है। इस तरह की घटना कमकम ही देखने में आती है। मिलीबग नियंत्रण के लिए प्रकृति की तरफ़ से कपास उत्पादक किसानों के लिए एनासिय्स नामक सम्भीरका एक गजब का तोहफा है। भीरडनूमा महीन सा यह जन्नोर आकार में तो बामुश्किल एक-दो मिलीमीटर लंबा ही होता है। एनासिय्स की प्रौढ़ मादा अपने जीवनकाल में सैकडों अंडे देती है पर एक मिलीबग के शरीर में एक ही अंडा देती है। इस तरह से एक एनासिय्स सैकडों मिलिबगों को परजीव्याभीत करने का मादा रखती है। मिलीबग के शरीर में एनासिय्स को अंडे से पूर्ण प्रौढ़ विकसित होने में तकरीबन 15 दिन का समय लगता है। इसीलिए तो एनासिय्स को अंडे देते वक्त मिलीबग की ऊमर का ध्यान रखना पड़ता है। गलती से ज्यादा छोटे मिलीबग में अंडा दिया गया तो प्रयाप्त भोजन के आभाव में मिलीबग के साथ-साथ एनासिय्स की भी मौत हो जाती है। खुदा न खास्ता एनासिय्स ने अपना अंडा एक इसे ऊमर दराज मिलीबग के शरीर में दे दिया जिसकी जिन्दगी दस दिन की भी न रह रही हो तो भी एनासिय्स के पूर्ण विकसित होने से पहले ही मिलीबग की स्वाभाविक मौत हो जायेगी। परिणाम स्वरूप एनासिय्स की भी मौत हो जायेगी। इसीलिए तो एनासिय्स का पुरा जोर रहता है कि अंडा उस मिलीबग के शरीर में दिया जाए जिसकी जिन्दगी के अभी कम से कम 15 दिन जरुर बच रहे हों। अंडा देने के लिए सही मिलीबग के चुनाव पर ही एनासिय्स की वंश वृध्दि की सफलता निर्भर करती है। मिलीबग के शरीर में अंड विस्फोटन के बाद ज्योंही एनासिय्स का शिशु मिलीबग को अंदर से खाना शुरू करता है, मिलीबग गंजा होना शुरू हो जाता है। इसका रंग भी लाल सा भूरा होना शुरू हो जाता है। मिलीबग का पाउडर उड़ना व इसका रंग लाल सा भूरा होना इस बात की निशानी है कि मिलीबग के पेट में एनासिय्स का बच्चा पल रहा है। मिलीबग को अंदर से खाते रह कर एक दिन एनासिय्स का किशोर मिलीबग के अंदर ही प्युपेसन कर लेता है। फ़िर एक दिन पूर्ण प्रौढ़ के रूप में विकसित होकर मिलीबग के शरीर से बाहर आने के लिए गोल सुराख़ करेगा। इस सुराख़ से एनासिय्स अपना स्वतन्त्र प्रौढिय जीवन जीने के लिए मिलीबग के शरीर से बाहर निकलेगा। और इस प्रक्रिया में मिलीबग को मिलती है मौत तथा अब वह रह जाता सिर्फ़ खाली खोखा। यहाँ एनासिय्स यानि कि अंगीरा के जीवन कि विभिन्न अवस्थाओं के फोटों दी गई है। कांग्रेस घास सम्मेत विभिन्न गैरफसली पौधे जो मिलीबग के लिए आश्रयदाता है, एनासिय्स कि वंश वृध्दि के लिए भी वरदान है क्योंकि इन्हे इन पौधों पर अपनी वंश वृध्दि के लिए मिलीबग बहुतायत में उपलब्ध हो जाता है|
ललित खेड़ा गावं के रमेश व् रामदेव ने तो इस कीट के नर को मिलीबग के खोखे में बैठी मादा से मधुर मिलन के चक्कर में खोखे के चक्कर काटता देख लिया व् इंतजार के बाद इस जोड़े को रति-रत होते भी कैमरे के परदे पर बखूबी देख लिया.  कीट के रूप में प्रकृति प्रदत इस कारगर कीटनाशी की सही पहचान होने व् इसके क्रिया-क्लापों की बारीकी से जानकारी होने पर कौन किसान इतना मूर्ख होगा जो मिलीबग नियंत्रण के लिए बाज़ार से खरीद कर अपनी फसल में कीटनाशकों का इस्तेमाल करेगा? 

Monday, June 1, 2009

जंगीरा- एक परजीव्याभ सम्भीरका

 जंगीरा हमारी फसलों में मिलीबग को काबू करने वाली एक परजीव्याभ सम्भीरका है। जी हाँ! उसी विदेशी मिलीबग को जिसने भारत में कपास की खेती के लिए गंभीर समस्या के रूप में देखा जाने लगा था। भला हो इन सम्भीरकाओं का जिन्होंने इस किटिया संकट से निजात दिलाने में जिला जींद के किसानों की भरपूर मदद की।
अंगीरा व् फंगिरा की तरह जंगीरा भी अपने बच्चे मिलीबग के पेट में ही पलवाता है। Hymenoptera वंशक्रम की यह सम्भीरका भी आकर में बहुत छोटी होती है। इसके शारीर की लम्बाई बामुश्किल 2 -3 मी.मी. ही होती है। पर अपने जीवनकाल में 100  से ज्यादा अंडे देती है पर एक मिलीबग के पेट में केवल एक ही अंडा देती है। इस को अंग्रेज किस नाम से पुकारते हैं- हमें नही मालूम। कीट विज्ञानं की भाषा में इसका नाम, खरना, कुनबा व् प्रजाति आदि भी- हमें नही मालूम। पर हमें यह अच्छी तरह से मालूम है कि Hymenoptera वंशक्रम की यह जंगीरा नामक सम्भीरका अपने बच्चे मिलीबग के पेट में पलवाती है। वंशवृद्धि के लिए इन्हें असाधारण कौशल की जरुरत होती है। आवश्यकता अनुसार भोजन उपलब्ध होने पर इसके नवजातों को पूर्ण विकसित होने के लिए 15 -16  दिन का समय लगता है।  इसीलिए इसकी प्रौढ़ मादा को अंडा देने के लिए ऐसे स्वस्थ मादा मिलीबग की तलाश रहती है जिसका जीवन अभी 18 -20  दिन का और बकाया हो। मिलीबग के पेट में अंडे से निकलते ही इस सम्भीरका के नवजात मादा मिलीबग को अन्दर-अन्दर ही खाना शुरू करते हैं। यह प्रक्रिया आरम्भ होते ही मिलीबग पौधों से रस पीना तो छोड़ देता है पर ना तो इसके शारीर से आटानुमा पाउडर उड़ता है और ना ही यह रंग बदलता है। मतलब ऊपर से देखने पर प्रकोपित मिलीबग सामान्य ही दिखाई देता है। इस भली सी सम्भीरका की अंडे से लेकर प्रौढ़ तक की सभी अवस्थाएं मिलीबग के पेट में ही पूरी होती हैं। पर  प्रौढ़ सम्भीरका अपना स्वतंत्र जीवन जीने के लिए हमेशा मिलीबग के अगले सिरे में सुराख़ करके ही बाहर निकलती है। इस प्रक्रिया में मिलीबग को मिलती है-मौत। यही तो किसान चाहते हैं। मिलीबग को ख़त्म करने के लिए किसान कीटनाशकों का इस्तेमाल भी इसीलिए करते हैं। अगर हम सभी को यह अच्छी तरह से जानकारी हो जाये कि मिलीबग को काबू करने के लिए अन्य कीटों के साथ-साथ जंगीरा नामक यह परजीव्याभ सम्भीरका भी हमारी फसलों में मौजूद है तो क्यों कोई किसान किसी कीटनाशक का प्रयोग करेगा?

Sunday, May 10, 2009

मिलीबग - खाली खोखाः अंगिरा ने किया यह हाल।


MEALYBUG PARASITOID

अंगिरा का 2007 में लिया गया फोटो
अंगिरा का प्रौढ़।
Whether it is Anagyrus or Aenasius spps.It does not make any difference for us and for mealybug too.Who reported it for first time in Haryana also does not make any difference for its parasitoidation of mealybugs.But it is true that this tinny wasp parasitizes mealybug populations upto 80 to 90 % in Jind distt of Haryana. The female parasitoidic wasp inserts its egg into the body of a mealybug. On hatching, larva of the wasp feeds on the mealybug internally and body color of the host starts turning brown.One female may lay more than 110 eggs in its life. Thus capable of parasitising 100 of mealybugs in its life.Actualy, we donot know its name, its fame and its family.We call it as ANGIRA.We the farmers of Nidana are witness to its emergence from a mummified mealybug. Its exit hole is circular and its antenae are small.We are highly thankful to nature and Angira for helping us in our fight against mealybug in cotton fields.

MEALYBUG PARASITOID
Originally uploaded by dalal.surender