2005 की साल हरियाणा प्रान्त में अमेरिकन कपास की साधारण किस्मों की जगह बी.टी. हाइब्रिडों का प्रचलन हुआ। इसके साथ ही कपास की फसल में फिनोकोक्स सोलेनोप्सिस नाम का मिलीबग भस्मासुर बन कर सामने आया और देखते-देखते ही कांग्रेस घास के पौधों पर भी छा गया। संयोग देखिये, अमेरिकन कपास, कांग्रेस घास व मिलीबग का निकासी स्थल एक ही है। हिंदुस्तान में आते ही मिलीबग को कांग्रेस घास के रूप में पूर्व परिचित, एक सशक्त वैकल्पिक आश्रयदाता मिल गया। कांग्रेस घास पर मिलीबग का किसानों के घातक कीटनाशकों से पुरा बचाव व सारे साल अपने व बच्चों के लिए भोजन का पुरा जुगाड़। पर प्रकृति की प्रक्रियाएं इतनी सीधी व सरल नही होती। बल्कि इनमेँ तो हर जगह हर पल द्वंद्व रहता है। प्रकृति में सुस्थापित भोजन श्रृंख्ला की कोई भी कड़ी इतनी कमजोर नही होतीं कि जी चाहे वही तोड़ दे।
ललित खेड़ा गावं के रमेश व् रामदेव ने तो इस कीट के नर को मिलीबग के खोखे में बैठी मादा से मधुर मिलन के चक्कर में खोखे के चक्कर काटता देख लिया व् इंतजार के बाद इस जोड़े को रति-रत होते भी कैमरे के परदे पर बखूबी देख लिया. कीट के रूप में प्रकृति प्रदत इस कारगर कीटनाशी की सही पहचान होने व् इसके क्रिया-क्लापों की बारीकी से जानकारी होने पर कौन किसान इतना मूर्ख होगा जो मिलीबग नियंत्रण के लिए बाज़ार से खरीद कर अपनी फसल में कीटनाशकों का इस्तेमाल करेगा?
